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अ॒ग्निं न मा॑ मथि॒तं सं दि॑दीप॒: प्र च॑क्षय कृणु॒हि वस्य॑सो नः । अथा॒ हि ते॒ मद॒ आ सो॑म॒ मन्ये॑ रे॒वाँ इ॑व॒ प्र च॑रा पु॒ष्टिमच्छ॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agniṁ na mā mathitaṁ saṁ didīpaḥ pra cakṣaya kṛṇuhi vasyaso naḥ | athā hi te mada ā soma manye revām̐ iva pra carā puṣṭim accha ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒ग्निम् । न । मा॒ । म॒थि॒तम् । सम् । दि॒दी॒पः॒ । प्र । च॒क्ष॒य॒ । कृ॒णु॒हि । वस्य॑सः । नः॒ । अथ॑ । हि । ते॒ । मदे॑ । आ । सो॒म॒ । मन्ये॑ । रे॒वान्ऽइ॑व । प्र । च॒र॒ । पु॒ष्टिम् । अच्छ॑ ॥ ८.४८.६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:48» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:12» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:6


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शिव शंकर शर्मा

अन्न-भक्षण का लाभ कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम) हे सर्वश्रेष्ठ ! रसमय अन्न (अपाम) तुमको हम पीवें। (अमृताः+अभूम) अमृत होवें (ज्योतिः+अगन्म) शरीरशक्ति या परमात्म ज्योति------(आगे का पाठ उपलब्ध नहीं है) ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दीप्ति उल्ला व पुष्टि

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सोम) = वीर्यशक्ते ! तू (मा) = मुझे (मथितं अग्निं न) = मथी हुई अग्नि के समान (सन्दिदीपः) = संदीप्त कर, जैसे मथित अग्नि चमक उठती है, इसी प्रकार हम तेरे से चमक उठें। (प्रचक्षय) = तू हमें प्रकृष्ट चक्षुवाला बना। हमारी दर्शन शक्ति को बढ़ा। (नः) = हमें (वस्यसः) = प्रशस्त वसुओंवाला (कृणुहि) = कर । [२] (अथा) = अब हे सोम ! (मदे) = मद व उल्लास के निमित्त मैं (हि) = निश्चय से (ते आमन्ये) = तेरा स्तवन करता हूँ। (रेवान् इव) = तू सब धनोंवाले की तरह होता हुआ (पुष्टिम् अच्छ) = पोषण की ओर प्रचर-गतिवाला हो। हे सोम ! तू हमारे अंग-प्रत्यंग को पुष्ट करनेवाला हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोम हमें दीप्त प्रकृष्ट चक्षुवाला - प्रशस्त वसुओंवाला - उल्लासमय व पुष्ट करे।
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शिव शंकर शर्मा

अन्नभक्षणस्य लाभमाह।

पदार्थान्वयभाषाः - हे सोम=हे सर्वश्रेष्ठ रसमयान्न ! त्वाम्। अपाम=पिबेम। तेन पानेन अमृता अभूम=भवेम। ज्योतिः=शरीरशक्तिं परमात्मज्योतिर्वा। अगन्म=गच्छेम। ततः। देवान्= इन्द्रियाणि इन्द्रियसामर्थ्यानि। अविदाम=विन्देम। ईदृशानस्मान्। अरातिः=आभ्यन्तरशत्रुः। नूनमिदानीम्। किं कृणवत्=किं करिष्यति। हे अमृत ! प्रवाहरूपेण सदा वर्तमान ! मर्त्यस्य। धूर्तिः=हिंसकः। किमु=किं करिष्यति। यदि स ईश्वररतोऽस्ति ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Light and shine me like fire from wood by friction, give me the eye to see the light and raise us to be masters of wealth, honour and excellence. O soma, drink of immortality, in the ecstasy of exhilaration, I concentrate and meditate on the self in the peace of divinity like a wealthy man of spiritual profusion. O bliss of exuberance, stimulate, inspire and raise me well to perfect health of body, mind and soul.