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अपा॑म॒ सोम॑म॒मृता॑ अभू॒माग॑न्म॒ ज्योति॒रवि॑दाम दे॒वान् । किं नू॒नम॒स्मान्कृ॑णव॒दरा॑ति॒: किमु॑ धू॒र्तिर॑मृत॒ मर्त्य॑स्य ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

apāma somam amṛtā abhūmāganma jyotir avidāma devān | kiṁ nūnam asmān kṛṇavad arātiḥ kim u dhūrtir amṛta martyasya ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अपा॑म । सोम॑म् । अ॒मृताः॑ । अ॒भू॒म॒ । अग॑न्म । ज्योतिः॑ । अवि॑दाम । दे॒वान् । किम् । नू॒नम् । अ॒स्मान् । कृ॒ण॒व॒त् । अरा॑ति । किम् । ऊँ॒ इति॑ । धू॒र्तिः । अ॒मृ॒त॒ । मर्त्य॑स्य ॥ ८.४८.३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:48» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:11» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:3


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यों ! (वयम्) हम सब मिलकर (अद्य) आजकल (अजैष्म) निखिल विघ्नों, दुःखों, क्लेशों और मानसिक आधियों को जीतें। (असनाम) उनको जीतकर नाना भोग विलास (असनाम) प्राप्त करें (च) और (अनागसः) निरपराध और निष्पाप (अभूम) होवें (उषः) हे उषा देवि ! (यस्मात्+दुःस्वप्न्यात्) जिस दुःस्वप्न से (अभैष्म) हम डरें (तत्) वह पापस्वरूप दुःस्वप्न (अप+उच्छतु) दूर होवे ॥१८॥
भावार्थभाषाः - इसका आशय यह है कि कल्पित अवस्तु और संकल्पमात्र में स्थित पदार्थों से न डरकर और उनकी चिन्ता न करके हम मनुष्य निखिल आपत्तियों को दूर करने की चेष्टा करें, जिससे हम सुखी होकर ईश्वर की और मनुष्यों की सेवा कर सकें। हे मनुष्यों ! जिससे यह अपूर्व जीवन सार्थक सफल और हितकर हो, वैसी चेष्टा सदा किया करो इति ॥१८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अमृत-देव-ज्योतिर्मय

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सोमम् अपाम) = हमने सोम का पान किया है और (अमृताः) = नीरोग [अमर] अभूम हो गए हैं। (ज्योतिः अगन्म) = ज्ञान के प्रकाश को प्राप्त किया है और (देवान् अविदाम) = दिव्यगुणों को प्राप्त करनेवाले हुए हैं। सोमरक्षण से हम शरीर में नीरोग, मन में दिव्य भावनाओंवाले, तथा मस्तिष्क में ज्ञानज्योतिवाले बने हैं। [२] इस सोमरक्षण के होने पर (नूनं) = निश्चय से (अरातिः) = शत्रु (अस्मान्) = हमारा (किं कृणवत्) = क्या कर सकता है? (उ) = और हे (अमृत) = हमें न मरने देनेवाले सोम ! (मर्त्यस्य) = किसी भी मनुष्य की (धूर्तिः) = हिंसकवृत्ति भी हमारी क्या हानि कर सकती है ? सोमरक्षण से हम न अन्तःशत्रुओं से आक्रान्त होते हैं, न बाह्यशत्रुओं से।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण से हम [१] शरीर में नीरोग बनते हैं [२] मन में देव [३] मस्तिष्क में ज्योतिर्मय [४] ये सोमरक्षण हमें अन्तः व बाह्य शत्रुओं का शिकार नहीं होने देता।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्याः ! वयं सर्वे मिलित्वा। अद्य=इदानीम्। अजैष्म=सर्वाणि दुःखानि सर्वांश्च क्लेशान्। जयेम अभिभवेम। जित्वा च असनाम=नानाभोगान् संभजेम। तथा वयं सर्वदा। अनागसः=निरपराधा=अपापाश्च। अभूम=भवेम। हे उषः ! यस्माद् दुःस्वप्न्याद्। वयम्। अभैष्म=भीताः स्म। तत्पापम्। अपोच्छतु=अपगच्छतु। अनेहस इत्यादि प्रथममन्त्रभाष्ये द्रष्टव्यम् ॥१८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - We have drunk the soma of immortality, we have become immortal, attained to the light of divinity, have known the organs of perception and imagination, and realised the divinities of light, power and excellence. What can the enemies internal and external do now against us? O lord immortal, soma, what can the violence of mortals do against us?