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अ॒न्तश्च॒ प्रागा॒ अदि॑तिर्भवास्यवया॒ता हर॑सो॒ दैव्य॑स्य । इन्द॒विन्द्र॑स्य स॒ख्यं जु॑षा॒णः श्रौष्टी॑व॒ धुर॒मनु॑ रा॒य ऋ॑ध्याः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

antaś ca prāgā aditir bhavāsy avayātā haraso daivyasya | indav indrasya sakhyaṁ juṣāṇaḥ śrauṣṭīva dhuram anu rāya ṛdhyāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒न्तरिति॑ । च॒ । प्र । अगाः॑ । अदि॑तिः । भ॒वा॒सि॒ । अ॒व॒ऽया॒ता । हर॑सः । दैव्य॑स्य । इन्दो॒ इति॑ । इन्द्र॑स्य । स॒ख्यम् । जु॒षा॒णः । श्रौष्टी॑ऽइव । धुर॑म् । अनु॑ । रा॒ये । ऋ॒ध्याः॒ ॥ ८.४८.२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:48» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:11» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:2


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - मनुष्य (यथा) जैसे (कलाम्) अपनी अङ्गुली से मृत नख को कटवाकर (संनयामसि) दूर फेंक देते हैं, (यथा+शफम्) जैसे पशुओं के मृत खुर को कटवा कर अलग कर देते हैं अथवा (यथा) जैसे (ऋणम्) ऋण को दूर करते हैं, (एव) वैसे ही (आप्त्ये) व्यापक संसार में जो (दुःस्वप्न्यम्) दुःस्वप्न विद्यमान है, (सर्वम्) उस सबको (संनयामसि) दूर फेंक देते हैं ॥१७॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर से प्रार्थना करे कि वह दुःस्वप्न न देखे, क्योंकि उससे हानि होती है। इसका आशय यह है कि अपने शरीर और मन को ऐसा स्वस्थ शान्त नीरोग और प्रसन्न बना रक्खे कि वह स्वप्न न देखे ॥१७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अन्तः च प्रागाः- अदितिः भवासि

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे सोम ! तू (अन्तः च प्रागा) = जब निश्चय से शरीर के अन्दर जाता है शरीर में व्याप्त होता है, तो (अदितिः भवासि) = अदीना देवमाता के रूप में होता है, हमारी अदीनता का कारण बनता है और दिव्यगुणों का निर्माण करनेवाला होता है। तू (दैव्यस्य हरसः) = उस देव के क्रोध का (अवयाता) = हमारे से पृथक् करनेवाला होता है। इस सोम के द्वारा सुन्दर जीवनवाले बनकर हम प्रभु के प्रिय होते हैं। [२] हे (इन्दो) = सोम ! तू (इन्द्रस्य) = इस जितेन्द्रिय पुरुष की (सख्यं) = मित्रता का (जुषाणः) = सेवन करता हुआ इस प्रकार राये ऐश्वर्य के लिए (अनुऋध्या:) = अनुकूलता से हमें प्राप्त होता है, (इव) = जैसे (श्रौष्टी) = शीघ्रगामी (अश्व धुरं) = रथ धुरा को प्राप्त होकर अभिमत देश की ओर ले जाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम [१] हमें स्वस्थ बनाता है [२] प्रभु का प्रिय बनता है। [३] ऐश्वर्य की ओर ले चलता है।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - मनुष्याः। यथा कलां=मृतनखं स्वाङ्गुल्याः। संनयामसि=अपसारयन्ति। यथा शफं मृतखुरमश्वादीनामपसारयन्ति। यथा च ऋणमपसारयन्ति। एव=तथैव। आप्त्ये त्रिते=यद् दुःस्वप्न्यं विद्यते। तत्सर्वं संनयामसि। अने० ॥१७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O soma, reaching the core of personality, you are internalised, assimilated as one with the body and creative mind of man, dispeller of divine anger, and friend of Indra, the soul. O soma, just like willing and obedient horses of the chariot harnessed and yoked, inspire us toward the wealth, honour and excellence of life.