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त्वं न॑: सोम वि॒श्वतो॑ वयो॒धास्त्वं स्व॒र्विदा वि॑शा नृ॒चक्षा॑: । त्वं न॑ इन्द ऊ॒तिभि॑: स॒जोषा॑: पा॒हि प॒श्चाता॑दु॒त वा॑ पु॒रस्ता॑त् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvaṁ naḥ soma viśvato vayodhās tvaṁ svarvid ā viśā nṛcakṣāḥ | tvaṁ na inda ūtibhiḥ sajoṣāḥ pāhi paścātād uta vā purastāt ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वम् । नः॒ । सो॒म॒ । वि॒श्वतः॑ । व॒यः॒ऽधाः । त्वम् । स्वः॒ऽवित् । आ । वि॒श॒ । नृ॒ऽचक्षाः॑ । त्वम् । नः॒ । इ॒न्दो॒ इति॑ । ऊ॒तिऽभिः॑ । स॒ऽजोषाः॑ । पा॒हि । प॒श्चाता॑त् । उ॒त । वा॒ । पु॒रस्ता॑त् ॥ ८.४८.१५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:48» मन्त्र:15 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:13» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:15


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (पितरः) हे श्रेष्ठ पुरुषो ! (यः+इन्दुः) जो आनन्दप्रद सोमरस (अमर्त्यः) चिरकालस्थायी है और जो (हृत्सु+पीतः) हृदय में पीत होने पर बलवर्धक होता है, जो ईश्वर की कृपा से (नः+मर्त्यान्+आविवेश) हम मनुष्यों को प्राप्त हुआ है, (तस्मै+सोमाय+हविषा+विधेम) उस सोम का अच्छे प्रकार प्रयोग करें और (अस्य) इस प्रयोग से (मृळीके) सुख में और (सुमतौ) कल्याणबुद्धि में (स्याम) रहें ॥१२॥
भावार्थभाषाः - श्रेष्ठ खाद्य पदार्थ का प्रयोग ऐसा करें कि जिससे सुख हो और बुद्धि न बिगड़े ॥१२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वयोधाः स्वर्वित्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सोम) = वीर्य ! (त्वं) = तू (नः) = हमारे लिए (विश्वतः) सब दृष्टिकोणों से (वयोधाः) = उत्कृष्ट जीवन को धारण करनेवाला है। (त्वं) = तू ही (स्ववित्) = प्रकाश को प्राप्त करानेवाला है। (नृचक्षाः) = मनुष्यों का ध्यान करनेवाला तू (आविश) = शरीर में सब अंगों में प्रवेशवाला हो। [२] हे (इन्दो) = सोम ! (त्वं) = तू (नः) = हमारे लिए (ऊतिभिः) = [ऊतयः - महतः प्राणाः] प्राणों के साथ (सजोषाः) = संगत हुआ-हुआ उनके साथ (प्रीयमाण) = होता हुआ (पश्चातात्) = पीछे से (उत वा) = अथवा (पुरस्तात्) = आगे से (पाहि) = रक्षित करनेवाला हो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- सुरक्षित सोम उत्कृष्ट जीवन को व प्रकाश को प्राप्त कराता है। यह प्राणों के साथ हमारा सर्वतः रक्षण करता है। सोमरक्षण के उद्देश्य से ही अगले सूक्त में 'इन्द्र' का उपासन है। इस उपासन को करनेवाला मेधावी 'प्रस्कण्व काण्व' सूक्त का ऋषि है-
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे पितरः ! य इन्दुः=सोमः। हृत्सु पीतः। अमर्त्यः सन्। मर्त्यानस्मान् आविवेश। तस्मै सोमाय हविषा विधेम। अस्य च मृळीके सुमतौ च स्याम ॥१२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Soma, immortal spirit of peace, power and bliss, you are the treasure giver of food, energy and life for the world. You are the treasure giver of heavenly joy and watcher and leading light of the people. O soma, fluent stream of life energy, loving and friendly, with all your powers and protections, safeguard and promote us in front, on the back and all round.