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त्राता॑रो देवा॒ अधि॑ वोचता नो॒ मा नो॑ नि॒द्रा ई॑शत॒ मोत जल्पि॑: । व॒यं सोम॑स्य वि॒श्वह॑ प्रि॒यास॑: सु॒वीरा॑सो वि॒दथ॒मा व॑देम ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

trātāro devā adhi vocatā no mā no nidrā īśata mota jalpiḥ | vayaṁ somasya viśvaha priyāsaḥ suvīrāso vidatham ā vadema ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्राता॑रः । दे॒वाः॒ । अधि॑ । वो॒च॒त॒ । नः॒ । मा । नः॒ । नि॒ऽद्रा । ई॒श॒त॒ । मा । उ॒त । जल्पिः॑ । व॒यम् । सोम॑स्य । वि॒श्वह॑ । प्रि॒यासः॑ । सु॒ऽवीरा॑सः । वि॒दथ॑म् । आ । व॒दे॒म॒ ॥ ८.४८.१४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:48» मन्त्र:14 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:13» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:14


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (त्याः) वे (अनिराः) अनिवार्य (अमीवाः) सर्व रोग हमारे शरीर से (अप+अस्थुः) दूर हो जाएँ। वे यद्यपि (तमिषीचीः) अत्यन्त बलवान् हैं, तथापि अब (निरत्रसन्) उनकी शक्ति न्यून हो गई और वे (अभैषुः) अत्यन्त दुर्बल हो गए हैं। इसके जाने का कारण यह है कि (सोमः) उत्तमोत्तम रस और अन्न (अस्मान्) हम लोगों को (आ+अरुहत्) प्राप्त होते हैं, जो (विहायाः) सर्व रोगों के विनाशक हैं और हम लोग (अगन्म) वहाँ आकर बसें, (यत्र) जहाँ (आयुः) आयु (प्रति+रन्ते) बढ़ती है ॥११॥
भावार्थभाषाः - इसमें सन्देह नहीं कि उत्तमोत्तम अन्न के खाने-पीने से और उत्तम गृह में रहने से रोग नहीं होते और शरीर में विद्यमान रोग भी नष्ट हो जाते हैं ॥११॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

न नींद, न गपशप

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (त्रातारः देवा:) = रक्षक देवो ! (नः) = हमें (अधिवोचत) = आधिक्येन ज्ञानोपदेश को प्राप्त कराओ। आपसे हमें वह ज्ञान प्राप्त हो जिससे कि (नः निद्रामा ईशत) = नींद हमारा ईश न बन पाए। (उत) = और (मा जल्पिः) = गपशप की आदत भी हमारी ईश न बने। ये 'सोये रहना व गपशप मारते रहना' सोमरक्षण के लिए सहायक नहीं। [२] सो नींद व गपशप से ऊपर उठकर यज्ञ आदि उत्तम कर्मों में प्रवृत्त हुए हुए हम नींद अर्थात् तमोगुण, गपशप अर्थात् रजोगुण इन दोनों से ऊपर उठकर सत्त्वगुण में अवस्थित हुए हुए (वयं) = हम (विश्वह) = सदा (सोमस्य) = सोम के (प्रियासः) = प्रिय हों और (सुवीरासः) = उत्तम वीर बने हुए हम (विदथम्) = ज्ञान का ही (आवदेम) = (समन्तात्) = कथन करें। यह ज्ञान का वातावरण ही सोमरक्षण के लिए अनुकूल है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम ज्ञानियों से उपदेश लेते हुए नींद व गपशप का परित्याग करें। सोमरक्षण द्वारा वीर बनते हुए सदा ज्ञान का चर्चन करें।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - त्याः=ताः। अनिराः=निराकर्तुमशक्याः। अमीवाः=सर्वे रोगाः। मम शरीरात्। अपास्थुः=अपगच्छन्तु। ताः सम्प्रति। निरत्रसन्=नितरां त्रस्ताः। पुनः। अभैषुः=भीता बभूवुः। कीदृशः=तमिषीचीः=बलवत्यः। अपगमे कारणमाह− सोमः=उत्तमोत्तमो रसः। अस्मान् अरुहत्। यो विहायाः=सर्वरोगविनाशकः। वयञ्च तत्रागन्म यत्र। आयुः। प्रतिरन्ते=प्रवर्धते ॥११॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O brilliant divines, saviours and leading lights of humanity and life’s joy, speak over to us of the pleasure and power of soma so that neither sloth and slumber nor chatter, prattle and inarticulation may overtake us. We pray we may all time, seasons and days be favourites of immortal soma of bliss and, wide awake and brave, we may realise knowledge, wisdom and a happy well governed order of society.