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त्वं सो॑म पि॒तृभि॑: संविदा॒नोऽनु॒ द्यावा॑पृथि॒वी आ त॑तन्थ । तस्मै॑ त इन्दो ह॒विषा॑ विधेम व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvaṁ soma pitṛbhiḥ saṁvidāno nu dyāvāpṛthivī ā tatantha | tasmai ta indo haviṣā vidhema vayaṁ syāma patayo rayīṇām ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वम् । सो॒म॒ । पि॒तृऽभिः॑ । स॒म्ऽवि॒दा॒नः । अनु॑ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । आ । त॒त॒न्थ॒ । तस्मै॑ । ते॒ । इ॒न्दो॒ इति॑ । ह॒विषा॑ । वि॒धे॒म॒ । व॒यम् । स्या॒म॒ । पत॑यः । र॒यी॒णाम् ॥ ८.४८.१३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:48» मन्त्र:13 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:13» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:13


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - मैं जैसे (ऋदूदरेण) शरीरहितकारी उदररक्षक (सख्या) मित्रसमान लाभदायक सोमरस को (सचेय) ग्रहण करता हूँ, तद्वत् अन्यान्य जन भी करें। (यः+पीतः) जो पीने पर (मा+न+रिष्येत्) मुझको हानि नहीं पहुँचाता है, वैसे स्वल्प पीने से किसी को हानि न पहुँचावेगा। (हर्य्यश्व) हे आत्मन् ! (अयम्+यः+सोमः) यह जो सोमरस (अस्मे+न्यधायि) हम लोगों के उदर में स्थापित है, वह चिरकाल तक हमें सुखकारी हो (तस्मै+प्रतिरम्+आयुः) उससे आयु अधिक बढ़े, ऐसी (इन्द्रम्+एमि) ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ ॥१०॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर से सब कोई प्रार्थना करें कि उत्तमोत्तम अन्न खा पीकर हम बलवान् और लोकोपकारी हों ॥१०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

द्यावापृथिवी का विस्तार

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सोम) = वीर्य! (त्वं) = तू (पितृभिः) = इन रक्षा करनेवाले लोगों के साथ (संविदानः) = ऐकमत्य को प्राप्त हुआ हुआ संगत हुआ हुआ (द्यावापृथिवी) = मस्तिष्क व शरीर को (अनु आततन्थ) = अनुकूलता से विस्तृत करनेवाला हो। तू मस्तिष्क को दीप्त व शरीर को सुदृढ़ बना । [२] हे (इन्दो) = सोम ! (तस्मै ते) = उस तेरे लिए (हविषा विधेम) = त्यागपूर्वक अदन के साथ प्रभुपूजन करें । त्यागपूर्वक अदन व प्रभुपूजन करते हुए हम तेरा रक्षण करें और (वयं) = हम (रयीणां) = सब आवश्यक ऐश्वर्यों के (पतयः स्याम) = स्वामी हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम मस्तिष्क व शरीर का ठीक विकास करता है- आवश्यक ऐश्वर्यों को प्राप्त कराता है।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - अहम्। ऋदूदरेण=मृदूदरेण=उदरस्य अबाधकेन। सख्या=सखिभूतेन सख्येव वा हितकरेण सोमरसेन। सचेय=संगच्छेय। हे हर्य्यश्व=आत्मन् इन्द्रियस्वामिन् ! यः पीतः सन्। मा न रिष्येत्=न मां हिंस्येत्। अयं यः सोमः। अस्मे=अस्मासु। न्यधायि=निहितोऽभूत्। तस्मै=सोमाय। प्रतिरमायुः। इन्द्रमेमि=याचे ॥१०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O soma, immortal joy and inspiration of existence, known well and abiding by the ancients and pranic energies of nature, you pervade over heaven and earth. O soma, peace, power and joy of the world, we pray to you for strength and joy with homage and oblations so that we may be masters, protectors and promoters of the wealths, honours and excellences of life.