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अप॒ त्या अ॑स्थु॒रनि॑रा॒ अमी॑वा॒ निर॑त्रस॒न्तमि॑षीची॒रभै॑षुः । आ सोमो॑ अ॒स्माँ अ॑रुह॒द्विहा॑या॒ अग॑न्म॒ यत्र॑ प्रति॒रन्त॒ आयु॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

apa tyā asthur anirā amīvā nir atrasan tamiṣīcīr abhaiṣuḥ | ā somo asmām̐ aruhad vihāyā aganma yatra pratiranta āyuḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अप॑ । त्याः । अ॒स्थुः॒ । अनि॑राः । अमी॑वाः । निः । अ॒त्र॒स॒न् । तमि॑षीचीः । अभै॑षुः । आ । सोमः॑ । अ॒स्मान् । अ॒रु॒ह॒त् । विऽहा॑याः । अग॑न्म । यत्र॑ । प्र॒ऽति॒रन्ते॑ । आयुः॑ ॥ ८.४८.११

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:48» मन्त्र:11 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:13» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:11


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (सोम+राजन्) हे सोम राजन् ! (नः) हमको (मृळय) सुखी कर (स्वस्ति) कल्याण दे। (तव+स्मसि) तेरे ही हम हैं, (व्रत्याः) हम संयमी और व्रती हैं, (तस्य) तू (विद्धि) इस बात को जान। (दक्षः+अळर्ति) हममें बल विद्यमान है (उत+मन्युः) और मननशक्ति भी विद्यमान है। (इन्दो) हे आनन्दप्रद ! (नः) हमको (अर्य्यः) शत्रु की (अनुकामम्) इच्छा के अनुसार (मा+परादाः) मत ले चल। इसको ईश्वरपरक ही लगा सकते हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - इसका अभिप्राय यह है कि ऐसा अन्न हम खाएँ, जिससे सुख और कल्याण हो। हम सदा संयमी होवें। अन्न खाकर सात्त्विक बल धारण करें और काम क्रोध आदि शत्रु के वशीभूत न होवें। इति ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अनिरा: अमीवाः अप अस्थुः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (विहायाः) = महान् यह (सोमः) = वीर्य (अस्मान् आ अरुहत्) = हमारे अङ्ग-प्रत्यङ्गों में आरुढ़ हुआ है। सो (त्याः) = वे (अनिरा:) = जिनका दूर करना कठिन है, अथवा [इरा अन्न] अन्नाभाववाली-जिनमें भूख मर जाती है, वे (अमीवा:) = बीमारियाँ (अप अस्थुः) = हमारे से दूर स्थित हुई हैं। ये (तमिषीची:) = बलसम्पन्न- अतिप्रबल रोग (निरत्रसन्) = निश्चय से हमें डराते हैं और (अभैषुः) = भयभीत करते हैं। सोमरक्षण द्वारा ये हमारे से भयभीत होकर दूर हो जाते हैं। [२] इस सोमरक्षण के द्वारा मनुष्य उस स्थिति में (अगन्म) = जाते हैं, (यत्र) = जिसमें कि (आयुः प्रतिरन्ते) = अपने आयुष्य को बढ़ानेवाले होते हैं। सोम सब रोगों को दूर करके हमारे लिए दीर्घजीवन को देनेवाला होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सोमरक्षण के द्वारा भयंकर रोग भी दूर हो जाते हैं और इस प्रकार नीरोगता व दीर्घजीवन प्राप्त होता है।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे सोम राजन् ! नोऽस्मान्। स्वस्ति=अविनाशाय। मृळय=सुखय। तव। स्मसि=स्मः। व्रत्याः=संयमिनो वयम्। तस्य=त्वम्। विद्धि। अस्माकं मध्ये। दक्षः=बलम्। अळर्ति=गच्छति विद्यते। उत। मन्युः=मननशक्तिरपि विद्यते। हे इन्दो ! नोऽस्मान्। अर्यः=अरेः। अनुकामम्। यथा कामम् मा परादाः=मा परादेहि ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let those difficult ailments subside and go far from here. Even though they are strong and fearful, let them be off from here. Potent soma has risen up in vigour and has energised us, and we have reached where life increases and delights through age in ecstasy.