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स्वा॒दोर॑भक्षि॒ वय॑सः सुमे॒धाः स्वा॒ध्यो॑ वरिवो॒वित्त॑रस्य । विश्वे॒ यं दे॒वा उ॒त मर्त्या॑सो॒ मधु॑ ब्रु॒वन्तो॑ अ॒भि सं॒चर॑न्ति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

svādor abhakṣi vayasaḥ sumedhāḥ svādhyo varivovittarasya | viśve yaṁ devā uta martyāso madhu bruvanto abhi saṁcaranti ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स्वा॒दोः । अ॒भ॒क्षि॒ । वय॑सः । सु॒ऽमे॒धाः । सु॒ऽआ॒ध्यः॑ । व॒रि॒वो॒वित्ऽत॑रस्य । विश्वे॑ । यम् । दे॒वाः । उ॒त । मर्त्या॑सः । मधु॑ । ब्रु॒वन्तः॑ । अ॒भि । स॒म्ऽचर॑न्ति ॥ ८.४८.१

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:48» मन्त्र:1 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:11» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:1


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (उषः) हे देवि उषे हे प्रकाशप्रदात्रि बुद्धे ! (तदन्नाय) उस अन्नवाले (तदपसे) उस कर्मवाले और (तम् भागम्) उस-उस भाग को (उपसेदुषे) प्राप्त करनेवाले अर्थात् जागरावस्था में जो-जो अन्न, जो जो कर्म और जो-जो भोग विलास करता है, वे ही-२ पदार्थ जिसको स्वप्न में भी प्राप्त हुए हैं, ऐसा जो (त्रिताय) समस्त संसार है और (द्विताय) एक-२ जीव है, उस संसार और उस जीव को (दुःस्वप्न्यम्) जो दुःस्वप्न प्राप्त होता है, उसको (वह) कहीं अन्यत्र लेजा, यह मेरी प्रार्थना है ॥१६॥
भावार्थभाषाः - त्रित तीनों लोकों का एक नाम त्रित है, क्योंकि यह नीचे ऊपर और मध्य इन तीनों स्थानों में जो तत=व्याप्त हो, वह त्रित=त्रितत।
टिप्पणी: द्वित=यह नाम जीव का इसलिये है कि इस लोक और परलोक से सम्बन्ध रखता है अथवा इस शरीर में भी रहता है और इसको छोड़ अन्यत्र भी रहता है, अतः उसको द्वित कहते हैं। अथवा कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय द्वारा इसका कार्य्य होता है, अतः इसको द्वित कहते हैं। मन्त्र का आशय यह है कि दुःस्वप्न से मानसिक और शारीरिक हानि होती है। अतः शरीर को ऐसा नीरोग रक्खे कि वह स्वप्न न देखे। प्रातःकाल का सम्बोधन इसलिये भी वारंबार किया गया है कि उस समय शयन करना उचित नहीं। एवं स्वप्न भी एक आश्चर्य्यजनक मानसिक व्यापार है, अतः इसका वर्णन वेद में पाया जाता है। इति ॥१६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुमेधाः स्वाध्यः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सुमेधाः) = उत्तम बुद्धिवाला व (स्वाध्यः) = उत्तम कर्मोंवाला होता हुआ मैं (वरिवोवित्तरस्य) = उत्कृष्ट वरणीय धनों को प्राप्त करानेवाले (स्वादो:) = जीवन को मधुर बनानेवाले (वयसः) = आयुष्य के प्रमुख साधनभूत सोमरूप अन्न का (अभक्षि) = सेवन करूँ। सोम को शरीर में ही सुरक्षित रखें। [२] उस सोम को मैं सुरक्षित रखूँ (यं) = जिसको (विश्वे) = सब (देवासः) = देववृत्ति के पुरुष, (उत) = और (मर्त्यासः) = लौकिक दृष्टिकोणवाले पुरुष भी (मधु ब्रुवन्तः) = ' यह अतिशयेन मधुर है', ऐसा कहते हुए (अभिसञ्चरन्ति) = प्राप्त करते हैं- इस सोम के रक्षण के लिए यत्नशील होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सुरक्षित सोम हमें [१] सुमेधा व सुकर्मा बनाता है। [२] यह जीवन को मधुर बनाता है [३] जीवन धनों को प्राप्त कराता है। इसलिए देव व सामान्य मनुष्य भी इसे 'मधु' कहते हुए प्राप्त करने के लिए यत्नशील होते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे उषः ! तदन्नाय=तदेवान्नं यस्य तस्मै। जागरावस्थायां यदेवान्नमोदनादिकं भुक्तं पीतं तदेव स्वप्नेऽपि प्राप्तं यस्य स तदन्नः। पुनः। तदपसे=तदेव अपः कर्म यस्य स तदपाः। तस्मै तदपसे=तत्कर्मणे। पुनः। तं भागम्। ते तं भागमंशम्। स्वप्ने। उपसेदुषे=प्राप्तवते। त्रिताय च=संसाराय च समुदाय। द्विताय च=जीवाय च एकैकस्मै। यद् दुःस्वप्न्यं तत् सर्वमन्यत्र। वह=प्रापय ॥१६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - An intelligent and dedicated reader of holy literature, I have enjoyed the delicious soma food of higher and holier quality which all divines and mortals of the world enjoy, saying ‘it is honey sweet and savoury’, when they meet in sacred gatherings.