वांछित मन्त्र चुनें

तद॑न्नाय॒ तद॑पसे॒ तं भा॒गमु॑पसे॒दुषे॑ । त्रि॒ताय॑ च द्वि॒ताय॒ चोषो॑ दु॒ष्ष्वप्न्यं॑ वहाने॒हसो॑ व ऊ॒तय॑: सु॒तयो॑ व ऊ॒तय॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tadannāya tadapase tam bhāgam upaseduṣe | tritāya ca dvitāya coṣo duṣṣvapnyaṁ vahānehaso va ūtayaḥ suūtayo va ūtayaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तत्ऽअ॑न्नाय । तत्ऽअ॑पसे । तम् । भा॒गम् । उ॒प॒ऽसे॒दुषे॑ । त्रि॒ताय॑ । च॒ । द्वि॒ताय॑ । च॒ । उषः॑ । दुः॒ऽस्वप्न्य॑म् । व॒ह॒ । अ॒ने॒हसः॑ । वः॒ । ऊ॒तयः॑ । सु॒ऽऊ॒तयः॑ । वः॒ । ऊ॒तयः॑ ॥ ८.४७.१६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:47» मन्त्र:16 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:10» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:16


0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (देवासः) हे दिव्यगुणयुक्त सभासदो ! (यद्+दुष्कृतम्) जो दुर्व्यसन पाप और क्लेश आदि आपत्ति (आविः) प्रकाशित हैं और जो (अपीच्यम्) अन्तर्हित=गुप्त हैं और (यद्) जो (विश्वम्) समस्त दुर्व्यसनादि पाप (आप्त्ये+त्रिते) व्याप्त तीन लोक में विद्यमान है, उस सबको (अस्मद्+आरे) हमसे दूर स्थल में (दधातन) रख दो। (अनेहसः) इत्यादि पूर्ववत् ॥१३॥
भावार्थभाषाः - हे भगवन् ! इस संसार में नाना विघ्न, नाना उपद्रव, विविध क्लेश और बहुविध प्रलोभन विद्यमान हैं, इन सबसे हमको दूर करो ॥१३॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

त्रित+द्वित

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (तदन्नाय) = उस प्रभु की प्राप्ति के लिए ही अन्नों का सेवन करनेवाले, (तदवसे) = प्रभुप्राप्ति के लिए ही कर्म करनेवाले तथा (तं भागं) = उस भजनीय प्रभु को (उपसेदुषे) = उपासित करनेवाले (त्रिताय) = [त्रीन् तरति ] काम-क्रोध-लोभ को तैर जानेवाले (च) = और (द्विताय) = [द्वौ तनोति ] विद्या व श्रद्धा दोनों का विस्तार करनेवाले के लिए, हे (उषः) = उषा की देवते ! (दुष्वप्न्यं) = अशुभ स्वप्नों को वह दूर करनेवाली हो। [२] हे उषाओ ! (वः ऊतयः) = आपके रक्षण (अनेहस:) = हमें निष्पाप बनानेवाले हैं। (वः ऊतयः) = आपके रक्षण (सु ऊतयः) = उत्तम रक्षण हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु प्राप्ति के लिए ही अन्नों का सेवन करनेवाला, प्रभु प्राप्त्यर्थ कर्मों को करनेवाला, प्रभु का उपासक, काम-क्रोध-लोभ को तैरनेवाला व विद्या और श्रद्धा व विकास करनेवाला बनता है। यह उषाकाल में प्रबुद्ध होकर उपासना में प्रवृत्त होता है और अशुभ स्वप्नों से बचा रहता है।
0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे देवासः=देवाः ! यद् दुष्कृतं=पापं दुःखम्। आविः=आविर्भूतं प्रकाशतां गतम्। यद् अपीच्यं=अन्तर्हितमस्ति। यद् विश्वं=दुष्कृतम्। आप्त्ये=व्याप्ते। त्रिते=त्रिषु लोकेषु वर्तते। तत् सर्वम्। अस्मद्+आरे=दूरे। दधातन=स्थापयत। व्याख्यातमन्यत् ॥१३॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For the sake of the man whose food is bad dreams, whose karma it is, whose entire share of life is this, for the sake of the man of threefold world of body, mind and soul, and for the good of the twice born humanity, O dawn of divine light, take away the bad dreams far off. Sinless are your protections, holy your safeguards.