आ यस्य॑ ते महि॒मानं॒ शत॑मूते॒ शत॑क्रतो । गी॒र्भिर्गृ॒णन्ति॑ का॒रव॑: ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
ā yasya te mahimānaṁ śatamūte śatakrato | gīrbhir gṛṇanti kāravaḥ ||
पद पाठ
आ । यस्य॑ । ते॒ । म॒हि॒मान॑म् । शत॑म्ऽऊते । शत॑क्रतो॒ इति॒ शत॑ऽक्रतो । गीः॒ऽभिः । गृ॒णन्ति॑ । का॒रवः॑ ॥ ८.४६.३
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:46» मन्त्र:3
| अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:1» मन्त्र:3
| मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:3
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे महेश ! (विश्वमानुषः) समस्त मनुष्य (ते) आपके (दत्तस्य) दिए हुए (यस्य) जिस (भूरेः) बहुत दान को (वेदति) जानते हैं, (तत्) उस (स्पार्हम्) स्पृहणीय (वसु) धन को जगत् में (आभर) भर दो ॥४२॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा से अपने और जगत् के कल्याण के लिये सदा प्रार्थना करनी चाहिये ॥४२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
शतमूति-शतक्रतु [प्रभु]
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (शतमूते) = सैंकड़ों रक्षणोंवाले व शतक्रतो सैंकड़ों प्रज्ञानों व कर्मोंवाले प्रभो ! (यस्य ते) = जिन आपकी (महिमानं) = महिमा को (कारवः) = यज्ञादि कर्मों को करनेवाले लोग (गीर्भिः) = ज्ञान की वाणियों के द्वारा (आगृणन्ति) = सदा स्तुत करते हैं। [२] हे प्रभो ! आपका वस्तुतः यशोगान तो क्रियाशील लोग ही करते हैं। उन्हीं को आपका रक्षण प्राप्त होता है, उन्हीं के लिए आप प्रज्ञान व शक्ति को प्राप्त कराते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- कारु-कुशलता से कर्म करनेवाला प्रभु का उपासक होता है। यही प्रभु से रक्षण प्रज्ञान व शक्ति को प्राप्त करता है।
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे महेश ! विश्वमानुषः=सर्वे मनुष्याः। ते=त्वया। दत्तस्य=दत्तम्। भूरेर्बहु। यस्य=यद्धनम्। अत्र कर्मणि षष्ठी। वेदति=जानाति। तत् स्पार्हं वसु आभर ॥४२॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Lord of a hundred forms of protection, high priest of a hundred forms of cosmic yajna, we know you whose majesty poets and artists celebrate with songs of adoration.
