अश्वेभिः वहते, उस्त्राः वस्ते
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (अश्वेभिः) = इन्द्रियाश्वों के द्वारा (वहते) = शरीररथ को लक्ष्य की ओर ले जाता है, वह (सप्ततीनां) = [सप्= To worship] प्रभुपूजन करनेवाली वेदवाणियों के (त्रिः सप्त) = तीन प्रकार से- आध्यात्मिक, आधिभौतिक व आधिदैविक अर्थ भेद से सात छन्दों में प्रतिपादित (उस्त्रा:) = ज्ञानरश्मियों को (वस्ते) = धारण करता है। [२] यह ज्ञानरश्मियों को धारण करनेवाला व्यक्ति (एभिः) = इन (सोमेभिः) = सोमकणों के द्वारा और (सोमसुद्भिः) = सोम का अभिषव करनेवाले पुरुषों के सम्पर्क में (सोमपाः) = सोम का पान [रक्षण] करनेवाला होता हुआ (दानाय) = सदा दान के लिए होता है - देने की वृत्तिवाला बनता है। (शुक्रपूतपा:) = शुक्र से वीर्य से (पूत) = पवित्र हुई हुई इन्द्रियों का रक्षण करनेवाला बनता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमें चाहिए कि [१] इन्द्रियाश्वों के द्वारा शरीररथ को लक्ष्य की ओर ले चलें । [२] वेदवाणियों की ज्ञान किरणों को धारण करें। [३] सोम का रक्षण करें। [४] सोम से सबल बनी हुई इन्द्रियों का रक्षण करें, [५] दान की वृत्तिवाले हों।