वांछित मन्त्र चुनें

यो अश्वे॑भि॒र्वह॑ते॒ वस्त॑ उ॒स्रास्त्रिः स॒प्त स॑प्तती॒नाम् । ए॒भिः सोमे॑भिः सोम॒सुद्भि॑: सोमपा दा॒नाय॑ शुक्रपूतपाः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yo aśvebhir vahate vasta usrās triḥ sapta saptatīnām | ebhiḥ somebhiḥ somasudbhiḥ somapā dānāya śukrapūtapāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । अश्वे॑भिः । वह॑ते । वस्ते॑ । उ॒स्राः । त्रिः । स॒प्त । स॒प्त॒ती॒नाम् । ए॒भिः । सोमे॑भिः । सो॒म॒सुत्ऽभिः॑ । सो॒म॒ऽपाः॒ । दा॒नाय॑ । शु॒क्र॒पू॒त॒ऽपाः॒ ॥ ८.४६.२६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:46» मन्त्र:26 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:6» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:26


0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - उस परमात्मा की कृपा से (दश) दश (श्यावाः) श्याव वर्ण के (आशवः) शीघ्रगामी घोड़े (नेमिम्) रथनेमि को (नि+वावृतुः) ले चलते हैं अर्थात् मेरे रथ में दश अश्व जोते जाते हैं, जो (ऋधद्रयः) बड़े वेगवाले हैं, (वीतवारासः) जिनके पूँछ बड़े लम्बे हैं और (मथ्नाः) जो रण में शत्रुओं को मथन करनेवाले हैं ॥२३॥
भावार्थभाषाः - जिनके निकट इस प्रकार की सामग्री हो, वे ऐसी प्रार्थना करें ॥२३॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अश्वेभिः वहते, उस्त्राः वस्ते

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (अश्वेभिः) = इन्द्रियाश्वों के द्वारा (वहते) = शरीररथ को लक्ष्य की ओर ले जाता है, वह (सप्ततीनां) = [सप्= To worship] प्रभुपूजन करनेवाली वेदवाणियों के (त्रिः सप्त) = तीन प्रकार से- आध्यात्मिक, आधिभौतिक व आधिदैविक अर्थ भेद से सात छन्दों में प्रतिपादित (उस्त्रा:) = ज्ञानरश्मियों को (वस्ते) = धारण करता है। [२] यह ज्ञानरश्मियों को धारण करनेवाला व्यक्ति (एभिः) = इन (सोमेभिः) = सोमकणों के द्वारा और (सोमसुद्भिः) = सोम का अभिषव करनेवाले पुरुषों के सम्पर्क में (सोमपाः) = सोम का पान [रक्षण] करनेवाला होता हुआ (दानाय) = सदा दान के लिए होता है - देने की वृत्तिवाला बनता है। (शुक्रपूतपा:) = शुक्र से वीर्य से (पूत) = पवित्र हुई हुई इन्द्रियों का रक्षण करनेवाला बनता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमें चाहिए कि [१] इन्द्रियाश्वों के द्वारा शरीररथ को लक्ष्य की ओर ले चलें । [२] वेदवाणियों की ज्ञान किरणों को धारण करें। [३] सोम का रक्षण करें। [४] सोम से सबल बनी हुई इन्द्रियों का रक्षण करें, [५] दान की वृत्तिवाले हों।
0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - दश=दशसंख्याकाः। श्यावाः=श्याववर्णाः। आशवः=अश्वाः मम। नेमिं=रथनेमिम्। निवावृतुः=निवर्तयन्ति, रथं वहन्तीत्यर्थः। कीदृशः=ऋधद्रयः=प्रवृद्धवेगाः। पुनः। वीतवारासः=वीलपुच्छाः। पुनः। मथ्नाः। मथनशीलाः ॥२३॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Come he who travels by radiations of cosmic energy, vested in and carrying thrice seven of seventy rays of the sun, he, protector of the pure and holy, protector of soma joy, come with these somas of bliss, with the makers of soma for giving us the gifts of joy.