वांछित मन्त्र चुनें
देवता: इन्द्र: ऋषि: वशोऽश्व्यः छन्द: जगती स्वर: निषादः

म॒हः सु वो॒ अर॑मिषे॒ स्तवा॑महे मी॒ळ्हुषे॑ अरंग॒माय॒ जग्म॑ये । य॒ज्ञेभि॑र्गी॒र्भिर्वि॒श्वम॑नुषां म॒रुता॑मियक्षसि॒ गाये॑ त्वा॒ नम॑सा गि॒रा ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

mahaḥ su vo aram iṣe stavāmahe mīḻhuṣe araṁgamāya jagmaye | yajñebhir gīrbhir viśvamanuṣām marutām iyakṣasi gāye tvā namasā girā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

म॒हः । सु । वः॒ । अर॑म् । इ॒षे॒ । स्तवा॑महे । मी॒ळ्हुषे॑ । अ॒र॒म्ऽग॒माय । जग्म॑ये । य॒ज्ञेभिः॑ । गीः॒ऽभिः । वि॒श्वऽम॑नुषाम् । म॒रुता॑म् । इ॒य॒क्ष॒सि॒ । गाये॑ । त्वा॒ । नम॑सा । गि॒रा ॥ ८.४६.१७

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:46» मन्त्र:17 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:4» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:17


0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यों ! (वः) आप लोगों को जब-२ (अन्धसः+मदेषु) अन्न का आनन्द प्राप्त हो अर्थात् ऋतु-२ में जब-२ अन्न की फसल हो, तब-२ (गिरा) निज-२ वाणी से (इन्द्रम्) परमात्मा का (अभि+गायत) गान अच्छे प्रकार करो। जो (वीरम्) महावीर (महा) महान् (विचेतसम्) और महा प्रज्ञान है, (नाम+श्रुत्यम्) जिसका नाम श्रवणीय है, पुनः (शाकिनम्) जो सब कार्य में समर्थ है, जिसकी शक्ति अनन्त-अनन्त है, (वचः+यथा) जहाँ तक वाणी की गति हो, वहाँ तक हे मनुष्यों ! उसका गान करो ॥१४॥
भावार्थभाषाः - उसकी कृपा से जब-२ कुछ लाभ हो, तब-२ ईश्वर के नाम पर उत्सव रचें। सब मिलकर उसका कीर्तिगान करें ॥१४॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मीढुषे- अरंगमाय - जग्मये

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे इन्द्र ! (महः वः) = महान् आपके (अरं) = गमन को [ॠ गतौ ] (सु इषे) = सम्यक् चाहता हूँ। इसीलिए (मीढुषे) = सुखों के वर्षक, (अरंगमाय) = पर्याप्त गमनवाले-सर्वत्र गमनवाले, (जग्मये) = सदा क्रियाशील [स्वाभाविकी ज्ञान-बल-क्रिया च] उस प्रभु के लिए (स्तवामहे) = हम स्तवन करते हैं। [२] हे प्रभो! आप (यज्ञेभिः) = यज्ञों के द्वारा और (गीर्भिः) = ज्ञान की वाणियों के द्वारा (विश्वमनुषां) = सब मननशील मरुतां मनुष्यों के (इयक्षसि) = सम्पर्कवाले होते हैं [यज संगतिकरणे] । ये मननशील पुरुष यज्ञों व ज्ञान की वाणियों के द्वारा आपको प्राप्त होते हैं। हे प्रभो ! मैं (नमसा) = नमन के साथ (गिरा) = स्तुतिवाणियों से गाये आपका गायन करता हूँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- मैं नमन यज्ञ व ज्ञान की वाणियों के द्वारा प्रभु का स्तवन करता हूँ। प्रभु ही हमें सब सुखों का वर्षण प्राप्त कराते हैं।
0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्याः ! वः=युष्माकम्। अन्धसः=अन्नस्य। मदेषु=प्राप्तेषु सत्सु। गिरा=वाण्या। इन्द्रम्। अभि+गाय=अभिगायत। वचो यथा=यथा वचः प्रवर्तेत=वचसो यावती गतिरस्ति तत्पर्य्यन्तं गायत। कीदृशमिन्द्रम्। वीरम्। महा=महान्तम्। विचेतसम्=प्रकृष्टविज्ञानम्। यस्य नाम श्रुत्यम् श्रवणीयम्। पुनः शाकिनं=शक्रम् ॥१४॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For the sake of ample food and energy for you all, O people, we adore, with holy yajnic hymns, the great, generous, all round mover and obliging visitor, Indra, loved of all people in general and vibrant divines in particular. You love to be with us, O lord, and I celebrate and felicitate you with hymns and homage.