द॒भ्रं चि॒द्धि त्वाव॑तः कृ॒तं शृ॒ण्वे अधि॒ क्षमि॑ । जिगा॑त्विन्द्र ते॒ मन॑: ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
dabhraṁ cid dhi tvāvataḥ kṛtaṁ śṛṇve adhi kṣami | jigātv indra te manaḥ ||
पद पाठ
द॒भ्रम् । चि॒त् । हि । त्वाव॑तः । कृ॒तम् । शृ॒ण्वे । अधि॑ । क्षमि॑ । जिगा॑तु । इ॒न्द्र॒ । ते॒ । मनः॑ ॥ ८.४५.३२
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:45» मन्त्र:32
| अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:48» मन्त्र:2
| मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:32
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - (न) पुनः (उक्थेषु) विविध स्तोत्रों से संयुक्त शुभकर्मों के प्राप्त होने पर मैं (ऋभुक्षणम्) महान् और (तुग्य्रावृधम्) जल के वर्धक पिता परमात्मा की (वर्तवे) ग्रहण करने के लिये स्तुति करता हूँ। तथा (सुते) अनुष्ठित (सोम) सोमयज्ञ में भी (सचा) कर्म के साथ साथ (इन्द्रम्) इन्द्र की ही स्तुति करता हूँ ॥२९॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यों ! जैसे प्रत्येक लौकिक या वैदिक कर्म के समय मैं ईश्वर की स्तुति करता हूँ, वैसा आप भी करें ॥२९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सन्त की वाणी व क्रिया का महत्त्व
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो! (त्वावतः) = आपको धारण करनेवाले का (दभ्रं) = थोड़ा-सा (चित् हि) = भी (कृतं) = किया हुआ (अधिक्षमि) = इस पृथिवी पर (शृण्वे) = प्रसिद्ध रूप में सुना जाता है, अर्थात् आपको धारण करनेवाले की छोटी-सी क्रिया का भी बड़ा महत्त्व होता है-लोगों पर उसका बड़ा प्रभाव होता है। [२] सो हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! (मनः) = हमारा मन (ते जिगातु) = आपके प्रति जानेवाला हो। हम सदा आपको स्मरण करें और आपका धारण करें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु को धारण करनेवाले की छोटी-सी क्रिया भी बड़ी महत्त्वपूर्ण होती है। उसका एक शब्द भी बड़ा प्रभाव पैदा करता है।
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - नकारश्चार्थः। न=पुनः। उक्थेषु=उक्थैः स्तोत्रैः संयुक्तेषु शुभकर्मसु प्राप्तेषु। अहम्। ऋभुक्षणम्=महान्तम्। तुग्य्रावृधम्=तुग्य्राया उदकस्य वर्धयितारम्। तुग्य्रा इति उदकनाम। निघण्टुः। परमात्मानम्। वर्तवे=स्वीकर्तुम्। स्तौमीति शेषः। पुनः। सुते=अनुष्ठिते। सोमे=सोमाख्ये यज्ञे। सचा=सार्थम् इन्द्रमेव स्तौमि ॥२९॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Just a little done by someone like you or someone protected by you resounds on the earth. O lord, I pray, may your gracious attention turn to me also.
