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यद्द॑धि॒षे म॑न॒स्यसि॑ मन्दा॒नः प्रेदिय॑क्षसि । मा तत्क॑रिन्द्र मृ॒ळय॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yad dadhiṣe manasyasi mandānaḥ pred iyakṣasi | mā tat kar indra mṛḻaya ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । द॒धि॒षे । म॒न॒स्यसि॑ । म॒न्दा॒नः । प्र । इत् । इय॑क्षसि । मा । तत् । कः॒ । इ॒न्द्र॒ । मृ॒ळय॑ ॥ ८.४५.३१

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:45» मन्त्र:31 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:48» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:31


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यों ! (वः) तुम (जनानाम्) मनुष्यों को (तरणिम्) दुःखों से पार लगानेवाले और (गोमतः) गौ, मेष आदि पशुओं से संयुक्त (वाजस्य) धन के (त्रदम्) रक्षक और दायक और (समानम्+उ) सर्वत्र समान ही उस देव की मैं (प्रशंसिषम्) प्रशंसा करता हूँ ॥२८॥
भावार्थभाषाः - जो ईश्वर सबका स्वामी है और जो समानरूप से सर्वत्र विद्यमान और हितकारी है, उसी की स्तुति मैं करता हूँ और आप लोग भी करें ॥२८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दधिषे-मनस्यसि-इयक्षसि

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो ! (मन्दान:) = स्तुति किये जाते हुए आप (यद्) = जिस शुभ को (दधिषे) = धारण करते हैं, (मनस्यसि) = हमारे लिए देने का संकल्प करते हैं और (इत्) = निश्चय से (इयक्षसि) = [प्रयच्छसि] हमारे लिए देते हैं, (तत्) = उसे (मा कः) = मत नष्ट करिये। [२] हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! आप शुभ वस्तुओं को देकर हमारे लिए (मृळय) = सुख को करनेवाले होइये।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हे प्रभो ! आप जिस शुभ को धारण करते हैं-हमारे लिए देने का संकल्प करते हैं और हमारे लिए देते हैं, उसे नष्ट न करिये, हमारे लिए दीजिए ही और हमें सुखी करिये।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्याः ! वः=युष्माकम्। जनानाम्। तरणिम्= दुःखेभ्यस्तारकम्। पुनः। गोमतः=गोमेषप्रभृतिपशुसंयुक्तस्य। वाजस्य=धनस्य। त्रदम्=त्रातारं दातारञ्च। पुनः। सर्वत्र समानमु=समानमेवेशम्। अहम्। प्रशंसिषम्=प्रशंसामि= स्तौमि ॥२८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, whatever you hold, whatever you think and desire, whatever you give, why not for me? O lord, pray be kind and gracious.