अयु॑द्ध॒ इद्यु॒धा वृतं॒ शूर॒ आज॑ति॒ सत्व॑भिः । येषा॒मिन्द्रो॒ युवा॒ सखा॑ ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
ayuddha id yudhā vṛtaṁ śūra ājati satvabhiḥ | yeṣām indro yuvā sakhā ||
पद पाठ
अयु॑द्धः । इत् । यु॒धा । वृत॑म् । शूरः॑ । आ । अ॒ज॒ति॒ । सत्व॑ऽभिः । येषा॑म् । इन्द्रः॑ । युवा॑ । सखा॑ ॥ ८.४५.३
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:45» मन्त्र:3
| अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:42» मन्त्र:3
| मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:3
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - (कवे) हे महाकवीश्वर ! (वसो) हे वासदाता (अग्ने) परमात्मन् ! (दुरितेभ्यः) पापों के आगमन के (पुरा) पूर्व ही और (मृध्रेभ्यः) हिंसकों के आगमन के (पुरा) पूर्व ही (नः) हमारी (आयुः) आयु को (प्रतिर) बढ़ाओ ॥३०॥
भावार्थभाषाः - अन्त में आशीर्वाद माँगते हैं। पापों और शत्रुओं से बचने के लिये केवल ईश्वर की शरण है, उसमें श्रद्धा और विश्वास और सबसे बढ़कर उसी की आज्ञा पर चलना है, इति ॥३०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
शत्रु पराजय
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (येषां) = जिनका (इन्द्रः) = शत्रुओं का विदावण करनेवाले प्रभु (युवा) = बुराइयों को दूर करनेवाला (सखा) = मित्र होता है, वह (अयुद्धः इत्) = योधा न होता हुआ भी (शूरः) = शूर बनता है और (युधावृतं) = योद्धाओं से (घिरे) = प्रबल शत्रु को भी (सत्वभिः) = व्रतों के द्वारा (आ अजति) = समन्तात् उखाड़ फेंकता है। [२] प्रभु की शक्ति से शक्तिसम्पन्न होकर यह काम-क्रोध-लोभ आदि प्रबल शत्रुओं को भी पराजित करनेवाला होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- प्रभु की मित्रता में कोई भी शत्रु हमारे लिए अजेय नहीं होता।
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे वसो=वासक ! अग्ने=सर्वगतदेव ! हे कवे=महाज्ञानिन् ! दुरितेभ्यः=पापेभ्यः। पुरा=प्रागेव। पुनः। मृध्रेभ्यः=हिंसकेभ्यः। पुरा। यदा दुरितानि हिंसकाश्चास्मान् हिंसितुमुद्युञ्जते। ततः प्रागेवेत्यर्थः। नोऽस्माकमायुः। प्र तिर=प्रवर्धय ॥३०॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Unequalled is Indra, irresistible, even when there is no war. The mighty hero by the very force of his presence and character throws off the enemy supported by brave warriors all round. Blessed are they whose friend is Indra, the mighty youthful heroic soul.
