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आ त्वा॑ र॒म्भं न जिव्र॑यो रर॒भ्मा श॑वसस्पते । उ॒श्मसि॑ त्वा स॒धस्थ॒ आ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā tvā rambhaṁ na jivrayo rarabhmā śavasas pate | uśmasi tvā sadhastha ā ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । त्वा॒ । र॒म्भम् । न । जिव्र॑यः । र॒र॒भ्म । श॒व॒सः॒ । प॒ते॒ । उ॒श्मसि॑ । त्वा॒ । स॒धऽस्थे॑ । आ ॥ ८.४५.२०

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:45» मन्त्र:20 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:45» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:20


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (उत) और (वयम्) हम उपासक (दूरात्) दूर देश से (इह) अपने-२ गृह और शुभ कर्म में (त्वाम्) तुझको (हवामहे) बुलाते हैं, जो तू (अबधिरम्) हमारे अभीष्ट सुनने के लिये सदा सावधान है और इसी कारण (श्रुत्कर्णम्) श्रवण पर (सन्तम्) सर्वत्र विद्यमान है, उस तुझको (ऊतये) अपनी रक्षा के लिये बुलाते हैं ॥१७॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यों ! तुम्हें निश्चय हो कि वह बधिर नहीं है, वह हमारा वचन सुनता है। वह प्रार्थना पर ध्यान देता है और आवश्यकता को पूर्ण करता है, अतः उसी की स्तुति प्रार्थना करो ॥१७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'सबका सहारा' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (शवसस्पते) = बल के स्वामिन्! (जिव्रयः रम्भं न) = वृद्ध जैसे एक आश्रययष्टि की सहायता लेता है उसी प्रकार हम (त्वा आ ररभ्मा) = आपका आश्रय लेनेवाले हों। आप ही तो निराधार होते हुए सर्वाधार हैं। [२] हम (सधस्थे) = मिलकर बैठने के यज्ञवेदिरूप स्थानों में अथवा आपके साथ मिलकर बैठने के स्थान हृदयदेश में (त्वा आ उश्मसि) = आपको ही चाहते हैं। आपकी प्राप्ति की कामनावाले होते हैं। आप ही तो वह स्थान हैं जहाँ सब कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु ही सर्वाधार हैं। प्रभु का ही हृदयदेश में ध्यान करते हुए कामना करें। प्रभु सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हैं।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - उत=अपि च वयमुपासकाः। अबधिरम्=अस्माकमभीष्टं श्रोतुं सदा अवहितम्। अतएव श्रुत्कर्णम्=प्रार्थनाश्रवणम्। पुनः। सन्तम्=सर्वत्र विद्यमानम्। ऊतये=रक्षायै। त्वा=त्वामेव। इह=स्वस्वगृहे। दूरात्। हवामहे ॥१७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O lord commander of power and prosperity, as weaker folks take to the staff for support, so do we depend on you for succour and sustenance and invoke your presence in our hall of yajna.