उ॒त त्वाब॑धिरं व॒यं श्रुत्क॑र्णं॒ सन्त॑मू॒तये॑ । दू॒रादि॒ह ह॑वामहे ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
uta tvābadhiraṁ vayaṁ śrutkarṇaṁ santam ūtaye | dūrād iha havāmahe ||
पद पाठ
उ॒त । त्वा॒ । अब॑धिरम् । व॒यम् । श्रुत्ऽक॑र्णम् । सन्त॑म् । ऊ॒तये॑ । दू॒रात् । इ॒ह । ह॒वा॒म॒हे॒ ॥ ८.४५.१७
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:45» मन्त्र:17
| अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:45» मन्त्र:2
| मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:17
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - (कवे) हे महाकवि हे परमज्ञानी देव (धृष्णो) हे पापियों के प्रति महाभयङ्कर देव ! यद्यपि आप (ककुहम्) महाश्रेष्ठ और सर्वोत्तम हैं तथापि (त्वाम्) आपको (इन्दवः) ये समस्त स्थावर और जङ्गम पदार्थ (मदन्तु) आनन्द देवें। हे भगवन् ! (यद्) जब हम उपासक (त्वाम्+पणिम्) आपको पणि अर्थात् व्यवहारकुशल जानकर (आ) आपके समीप और आपकी ओर होकर (ईमहे) अपना अभीष्ट माँगें ॥१४॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर स्वयं पणि है, उसको जो तुम दोगे, उसके बदले में वह भी कुछ तुमको देगा, अतः उसकी सेवा करो ॥१४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
अबधिरं श्रुत्कर्णम्
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (उत) = और (वयं) = हम (दूरात्) = दूर से ही आपके उपासक न होते हुए भी (इह) = यहाँ इस जीवन में (ऊतये) = रक्षण के लिए (त्वा) = आपको (हवामहे) पुकारते हैं। [२] उन आपको हम पुकारते हैं जो (अबधिरं) = बधिर नहीं हैं। (श्रुत्कर्णम्) = श्रवण पर कर्णोंवाले हैं। जिनके कान सदा सुनने में लगे हैं। (सन्तम्) = जो श्रेष्ठ हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- प्रभु की प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती। यह बहरे कानों पर नहीं पड़ती।
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे कवे=परमज्ञानिन् ! हे धृष्णो ! पापान् प्रति भयंकर ! इन्दवः=भूमे स्थावरा जङ्गमाश्च पदार्थाः। ककुहं चित्=सर्वश्रेष्ठं सर्वोपरि। त्वा=त्वाम्। मदन्तु=आनन्दयन्तु। हे इन्द्र ! यद्=यदा वयम्। पणिं=व्यवहारकुशलं त्वा=त्वाम्। आ+ईमहे=आभिमुख्येन याचामहे ॥१४॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - And from afar we invoke and call upon you for protection and progress. You are everywhere, your ears are sensitive and you are eager to hear the call of the seeker.
