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इ॒मां धियं॒ शिक्ष॑माणस्य देव॒ क्रतुं॒ दक्षं॑ वरुण॒ सं शि॑शाधि । ययाति॒ विश्वा॑ दुरि॒ता तरे॑म सु॒तर्मा॑ण॒मधि॒ नावं॑ रुहेम ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

imāṁ dhiyaṁ śikṣamāṇasya deva kratuṁ dakṣaṁ varuṇa saṁ śiśādhi | yayāti viśvā duritā tarema sutarmāṇam adhi nāvaṁ ruhema ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इ॒माम् । धिय॑म् । शिक्ष॑माणस्य । दे॒व॒ । क्रतु॑म् । दक्ष॑म् । व॒रु॒ण॒ । सम् । शि॒शा॒धि॒ । यया॑ । अति॑ । विश्वा॑ । दुः॒ऽइ॒ता । तरे॑म । सु॒ऽतर्मा॑णम् । अधि॑ । नाव॑म् । रु॒हे॒म॒ ॥ ८.४२.३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:42» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:28» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:3


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (अनु+व्रता) कर्मों के अनुसार (यः) जो वरुणवाच्य परमात्मा (श्वेतान्) श्वेत (निर्णिजः) किरणों को अर्थात् दिनों को (अधि+चक्रे) बनाता है और (कृष्णान्) कृष्ण किरणों को अर्थात् रात्रियों को बनाता है अथवा (श्वेतान्) सात्त्विक और (कृष्णान्) तद्विपरीत तामस (निर्णिजः) जीवों को बनाता है। पुनः (अनु+व्रता) कर्म के अनुसार ही (सः) वह वरुण (पूर्व्यम्+धाम) पूर्व धाम को (ममे) रचता है। (यः) जो (स्कम्भेन) स्व महिमा से (रोदसी) परस्पर रोधनशील द्यावापृथिवी को (वि+अधारयत्) अच्छे प्रकार धरे हुए है। यहाँ लौकिक दृष्टान्त देते हैं (अजः+न+द्याम्) जैसे सूर्य अपने परिस्थित ग्रहों को धारण करता है। तद्वत् ॥१–०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुतर्मा नौका

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (देव) = प्रकाशमय (वरुण) = नियामक देव! (इमां धियं) = इस ज्ञानपूर्वक किये जाते हुए कर्म को (शिक्षमाणस्य) = अनुष्ठान करते हुए मेरे (क्रतुं) = प्रज्ञान को व (दक्षं) = बल को (संशिशाधि) = सम्यक् तीक्ष्ण करिये। आप से प्राप्त कराये गये ज्ञान व बल के द्वारा ही तो मैं इस कर्म को कर पाऊँगा । [२] आपके अनुग्रह से हम उस (सुतर्माणम्) = सम्यक् तरानेवाली (नावं) = यज्ञरूप नौका पर (अधिरुहेम) = आरूढ़ हों, (यया) = जिसके द्वारा (विश्वा) = सब बुराइयों को (अति तरेम) = तैर जाएँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु से प्रज्ञान व शक्ति को प्राप्त करके हम यज्ञात्मक कर्मों में प्रवृत्त हों। ये यज्ञ ही सब दुरितों को तैर जाने के लिए नाव हैं।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - अनुव्रता=व्रतानि=कर्माणि लक्षीकृत्य। यो वरुणः। श्वेतान्। निर्णिजो रश्मीन् दिवसानित्यर्थः। अधिचक्रे=अधिकरोति। निर्मातीत्यर्थः। पुनः। कृष्णान्। निर्णिजः=रात्रीः। चक्रे। यद्वा श्वेतान्=सात्त्विकान्। कृष्णान्=तद्विपरीतान्। निर्णिजः= जीवान्। करोतीत्यर्थः। सः। अनुव्रता=अनुव्रतानि। व्रतानि कर्माणि लक्षीकृत्य च। पूर्व्ये=पूर्ववत् पूर्णं पूर्वं वा। धाम=स्थानं। ममे=निर्माति। यश्च पुनः। स्कम्भेन=स्वमहिम्ना। रोदसी=परस्पररोधनशीले द्यावापृथिव्यौ। वि=विशेषेण। अधारयत्=धारयति। अत्र लौकिकदृष्टान्तः, अजो न द्याम्=सूर्य्य इव द्याम्। यथा सूर्य्यः ग्रहान् धारयति तद्वत् ॥१–०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Varuna, self-refulgent lord of vision and omniscience, a seeker of light and wisdom as I am, pray sharpen, energise and confirm my intelligence, will and expertise by which we may ride on the efficient ark of navigation and cross over all the evils and difficulties of the world.