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ए॒वा व॑न्दस्व॒ वरु॑णं बृ॒हन्तं॑ नम॒स्या धीर॑म॒मृत॑स्य गो॒पाम् । स न॒: शर्म॑ त्रि॒वरू॑थं॒ वि यं॑सत्पा॒तं नो॑ द्यावापृथिवी उ॒पस्थे॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

evā vandasva varuṇam bṛhantaṁ namasyā dhīram amṛtasya gopām | sa naḥ śarma trivarūthaṁ vi yaṁsat pātaṁ no dyāvāpṛthivī upasthe ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ए॒व । व॒न्द॒स्व॒ । वरु॑णम् । बृ॒हन्त॑म् । न॒म॒स्य । धीर॑म् । अ॒मृत॑स्य । गो॒पाम् । सः । नः॒ । शर्म॑ । त्रि॒ऽवरू॑थम् । वि । यं॒स॒त् । प॒तम् । नः॒ । द्या॒वा॒पृ॒थि॒वी॒ इति॑ । उ॒पऽस्थे॑ ॥ ८.४२.२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:42» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:28» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:2


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (अधिक्षितः) सर्वोपरि निवास करते हुए और सबके ऊपर अधिकार रखते हुए (यस्य) जिस परमदेव के (श्वेता) श्वेत और दिव्य (विचक्षणा) तेज (तिस्रः+भूमीः) तीनों भूमियों में और (उत्तराणि) अत्युत्तम (त्रिः) तीनों भुवनों में (पप्रतुः) पूर्ण हैं और जिस वरुण का (सदः) यह जगद्रूप भवन (ध्रुवम्) निश्चल और अविनश्वर है। (सः) वही देव (सप्तानाम्) सर्पणशील जङ्गम और स्थावर पदार्थमात्र का (इरज्यति) स्वामी है, अतः हे मनुष्यों ! उसी की पूजा करो ॥९॥
भावार्थभाषाः - इस ऋचा द्वारा परमात्मा की महती शक्ति दिखलाते हैं। जीवात्मा की दृष्टि में ये तीन लोक हैं, परन्तु लोक-लोकान्तर की कोई संख्या नहीं है। आनन्तर यह सृष्टि है। परमात्मा उनसे भी ऊपर रहता हुआ सबमें है, यह इसकी आश्चर्य्यलीला है। हे मनुष्यों ! विचारदृष्टि से इसकी विभूतियाँ देखो और तुम क्या हो, सो भी विचारो ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'बृहन्+ धीर+अमृतगोपा' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एवा) = इस प्रकार - गतमन्त्र में वृणत प्रकार से (बृहन्तं) = उस महान् (वरुणं) = वरुण को (वन्दस्व) = वन्दित कर । (अमृतस्य गोपाम्) = अमृतत्व के रक्षक (धीरं) = उस ज्ञानी प्रभु को (नमस्या) = नमन कर, उसको पूजित कर। [२] (सः) = वे प्रभु (नः) = हमारे लिए (त्रिवरूथं) = तीनों 'ज्ञान, कर्म व उपासना' रूप धनोंवाले [वरूथं - Wealth] (शर्म) = शरीरगृह को (वियंसत्) = दें। (द्यावापृथिवी) = ये द्युलोक व पृथिवीलोक (उपस्थे) = अपनी गोद में (नः पातम्) = हमें सुरक्षित करें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम उस महान् धीर अमृत के रक्षक प्रभु का वन्दन व नमन करें। वे हमें 'ज्ञान, कर्म व उपासना' रूप सम्पत्तिवाले शरीरगृह को प्राप्त कराएँगें और इस द्यावापृथिवी की गोद में हम सुरक्षित रहेंगे। द्युलोक हमारा पिता होगा, पृथिवी माता ।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - अधिक्षितः=सर्वोपरि निवसतः सर्वं च शासतश्च। यस्य वरुणस्य। श्वेता=श्वेतानि=श्वेतवर्णदिव्यानि। विचक्षणाः= तेजांसि। तिस्रो भूमीः। पुनः। उत्तराणि=उ=वराणि= उत्तमानि। त्रिः=त्रीणि भुवनानि। पप्रतुः=प्रथयन्ति= व्याप्नुवन्ति। यस्य च वरुणस्य। सदः=जगदात्मकं स्थानम्। ध्रुवम्=निश्चलमविनश्वरमस्ति। सः। सप्तानां=सर्पणशीलानां गतिमतामगतिमताञ्च सर्वेषां भुवनानां भूतानाञ्च। इरज्यति=ईष्टे स्वामी वर्तते। सिद्धमन्यत् ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Thus worship and adore Varuna, great and infinite, worthy of reverence, undisturbed, protector of the laws of Dharma. May the lord provide us the threefold world of earth, heaven and the skies as a home of peace and security in freedom and joy. May the heaven and earth hold, protect and caress us as their darling children in their lap.