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देवता: वरुणः ऋषि: नाभाकः काण्वः छन्द: जगती स्वर: निषादः

यस्य॑ श्वे॒ता वि॑चक्ष॒णा ति॒स्रो भूमी॑रधिक्षि॒तः । त्रिरुत्त॑राणि प॒प्रतु॒र्वरु॑णस्य ध्रु॒वं सद॒: स स॑प्ता॒नामि॑रज्यति॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yasya śvetā vicakṣaṇā tisro bhūmīr adhikṣitaḥ | trir uttarāṇi papratur varuṇasya dhruvaṁ sadaḥ sa saptānām irajyati nabhantām anyake same ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यस्य॑ । श्वे॒ता । वि॒ऽच॒क्ष॒णा । ति॒स्रः । भूमीः॑ । अ॒धि॒ऽक्षि॒तः । त्रिः । उत्ऽत॑राणि । प॒प्रतुः॑ । वरु॑णस्य । ध्रु॒वम् । सदः॑ । सः । स॒प्ता॒नाम् । इ॒रज्य॒ति॒ । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.४१.९

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:41» मन्त्र:9 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:27» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:9


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यों ! आप वरुणदेव की महिमा देखिये। (यस्मिन्) जिस वरुण में (विश्वा) सम्पूर्ण (काव्या) काव्यकलाप (श्रिता) आश्रित है। यहाँ दृष्टान्त देते हैं−(चक्रे) रथ के चक्र में (नाभिः+इव) स्थापित रहता है। तद्वत् उस परमदेव में स्वयं काव्यकलाप स्थित हैं। हे मनुष्यों ! उस (त्रितम्) त्रिलोकव्यापी वरुण को (जूती) शीघ्र और प्रेम से (सपर्य्यत) पूजो, शीघ्रता में दृष्टान्त देते हैं−(गावः+न) जैसे गाएँ (व्रजे) गोष्ठ में (संयुजे) संयुक्त होने के लिये शीघ्रता करती हैं। तद्वत्। पुनः (युजे) युग्य में जैसे मनुष्य (अश्वान्) घोड़ों को (अयुक्षत) जोतते हैं, तद्वत् हे मनुष्यों ! आप अपने को ईश्वर की पूजा के लिये शीघ्रता करो ॥६॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर स्वयं महाकवि है, तथापि अपनी वाणी पवित्र करने के लिये ईश्वरीय स्तोत्र रचते हैं। स्वकल्याणार्थ उसको पूजो। आलस्य मत करो ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स सप्तानाम् इरज्यति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यस्य) = जिस (तिस्रः भूमी:) = तीनों पृथिवी, अन्तरिक्ष व द्युलोक-लोकों में [भूमियों में] (अधिक्षित:) = अधिष्ठातृरूपेण निवास करते हुए प्रभु के (विचक्षणा) = विशेषरूप से प्रकाश को करनेवाले (श्वेता) = उज्ज्वल शक्ति व ज्ञान के तेज (त्रिः उत्तराणि) = तीनों उत्कृष्ट 'शरीर-मन व मस्तिष्क' रूप लोकों का (पप्रतुः) = पूरण करते हैं। उस (वरुणस्य) = पापनिवारक प्रभु का (सदः) = स्थान (ध्रुवं) = ध्रुव है। इस ब्रह्मलोक में पहुँचकर जीव 'अव्यय' स्थान को प्राप्त कर लेता है। (सः) = वे वरुण (सप्तानाम्) = सातों लाकों के 'भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यम्' के (इरज्यति) = ऐश्वर्यवाले हैं। ये सातों लोक प्रभु का ही ऐश्वर्य हैं। इस प्रभु के उपासन से (समे) = सब (अन्यके) = शत्रु (नभन्ताम्) = नष्ट हो जाएँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - तीनों लोकों के अधिष्ठाता प्रभु हमारे 'शरीर, मन व मस्तिष्क' को शक्ति व ज्ञान के तेज से पूरित करते हैं। ये प्रभु ही सातों लोकों के स्वामी हैं। इनके अनुग्रह से हमारे सब शत्रु विनष्ट हो जाएँ।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्याः ! वरुणस्य महिमानं पश्यत। यस्मिन् वरुणे। विश्वानि। काव्या=काव्यानि=कविकर्माणि। चक्रे= नाभिरिव। श्रिता=श्रितानि। तं त्रितं=त्रिषु स्थानेषु ततं व्याप्तम्। जूती=शीघ्रमेव। सपर्य्यत। पूजयत। व्रजे=गोष्ठे संयुजे=संयोगार्थं। गावो न=यथा व्रजं गन्तुं गावः शीघ्रतां कुर्वन्ति। यथा च मनुष्याः। युजे=युग्ये। अश्वान्। अयुक्षत=युञ्जन्ति। तद्वत्। शेषं पूर्वमुक्तम् ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The refulgent glory of Varuna who rules over everything illuminates the three worlds of earth, skies and heaven and rises over the three higher heavens. Indeed he pervades and rules over the constant universe of sevenfold order and illuminates it with light and beauty. May all darkness, ugliness and enmity be eliminated.