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य आ॒स्वत्क॑ आ॒शये॒ विश्वा॑ जा॒तान्ये॑षाम् । परि॒ धामा॑नि॒ मर्मृ॑श॒द्वरु॑णस्य पु॒रो गये॒ विश्वे॑ दे॒वा अनु॑ व्र॒तं नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ya āsv atka āśaye viśvā jātāny eṣām | pari dhāmāni marmṛśad varuṇasya puro gaye viśve devā anu vrataṁ nabhantām anyake same ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । आ॒सु॒ । अत्कः॑ । आ॒ऽशये॑ । विश्वा॑ । जा॒तानि॑ । ए॒षा॒म् । परि॑ । धामा॑नि । मर्मृ॑शत् । वरु॑णस्य । पु॒रः । गयः॑ । विश्वे॑ । दे॒वाः । अनु॑ । व्र॒तम् । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.४१.७

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:41» मन्त्र:7 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:27» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:7


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (पृथिव्याम्+अधि) पृथिवी के ऊपर दर्शनीय और विज्ञेय (यः) जो परमात्मा (ककुभः) सम्पूर्ण दिशाओं को (निधारयः) धारण करता है, (स माता) वही जगत् का भी निर्माता, पाता और संहर्ता है (वरुणस्य) उसी परमात्मा का (तत् पदम्) वह स्थान (पूर्व्यम्) पूर्ण और अति प्राचीन है और (सप्त्यम्) सबके जानने योग्य है (सः+हि) वही (गोपाः+इव) गोपालक के समान जगत् का पालक है, वह (ईर्यः) सर्वश्रेष्ठ ईश्वर है (नभन्ताम्) इत्यादि पूर्ववत् ॥४॥
भावार्थभाषाः - जिस कारण वह जगत् का कर्ता है, अतः सर्व भाव से वही पूज्य और उपास्यदेव है ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

आसु अत्कः आशये

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो वरुण (आसु) = इन लोकों व प्रजाओं में (अत्कः) = [ व्याप्तः ] व्याप्त हुए हुए (आशये) = रहते हैं और (एषां) = इन लोकों के (विश्वा) = सब (जातानि) = प्रादुर्भावों को तथा इन प्रजाओं के (धामानि) = तेजों को (परिमर्मृशत्) = छूते हैं [मृश्, To handle ] व्यवस्थित करते हैं। [२] (वरुणस्य) = इस शासक प्रभु के (पुरः) = सामने ही गये, अपने-अपने घर में, स्थान में (देवाः) = सब देव (व्रतं) = अपने-अपने व्रत का (अनु) [गच्छन्ति] = अनुसरण करते हैं। हम सब इस प्रभु के समक्ष होते हुए कार्य करेंगे तो (समे) = सब (अन्यके) = शत्रु (नभन्ताम्) = अवश्य नष्ट होंगे ही।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- प्रभु ही व्यापकता के द्वारा सबका नियमन कर रहे हैं। प्रभु के स्मरण से ही सब शत्रुओं का विनाश होता है।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - पृथिव्यामधि=पृथिव्या उपरि। दर्शतः=दर्शनीयः। विज्ञेयश्च। यो वरुणः। ककुभः=सर्वा दिशः। निधारयः=निधारयति। स एव। माता=जगतो निर्मातास्ति। तस्यैव वरुणस्य तत्पदं पूर्व्यं पूर्णं प्राचीनं। सप्त्यं=सर्वैः सर्पणशीलं विद्यते। स हि=स एव। गोपा इव=गोपालक इव। सर्वपालकः। तथा। ईर्य्यः=गम्योऽस्ति। शेषं व्याख्यातम् ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Varuna is the one who vibrates at the heart of all these people and pervades all things born, immanent in and transcending over all regions of the universe. Indeed the divinities of nature and humanity stand ready in harness before the presence of Varuna, all committed to his law and their duty in the law. May all negativities and enmities vanish from the world.