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यस्मि॒न्विश्वा॑नि॒ काव्या॑ च॒क्रे नाभि॑रिव श्रि॒ता । त्रि॒तं जू॒ती स॑पर्यत व्र॒जे गावो॒ न सं॒युजे॑ यु॒जे अश्वाँ॑ अयुक्षत॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yasmin viśvāni kāvyā cakre nābhir iva śritā | tritaṁ jūtī saparyata vraje gāvo na saṁyuje yuje aśvām̐ ayukṣata nabhantām anyake same ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यस्मि॑न् । विश्वा॑नि । काव्या॑ । च॒क्रे । नाभिः॑ऽइव । श्रि॒ता । त्रि॒तम् । जू॒ती । स॒प॒र्य॒त॒ । व्र॒जे । गावः॑ । न । स॒म्ऽयुजे॑ । यु॒जे । अश्वा॑न् । अ॒यु॒क्ष॒त॒ । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.४१.६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:41» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:27» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:6


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यगण ! (सः) वह वरुणवाच्य ईश्वर (क्षपः) रात्रि में भी (परि+षस्वजे) व्यापक है अर्थात् रात्रि में भी मनुष्यों के सर्व कर्मों को देखा करता है, (दर्शतः) परम दर्शनीय (सः) वह ईश्वर (उस्रः) सर्वव्यापी होकर (मायया) निज शक्ति और बुद्धि से (परि) चारों तरफ (विश्वम्) सकल पदार्थ को (नि+दधे) अच्छे प्रकार धारण किये हुए है। (तस्य+व्रतम्) उसके व्रत को (वेनीः) उससे कामनाओं की इच्छा करती हुई सारी प्रजाएँ (तिस्रः+उषः) तीन कालों में (अवर्धयन्) बढ़ा रही हैं। अर्थात् भूत, भविष्यत् और वर्तमान या प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल में उसकी कीर्ति बढ़ा रही हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - वह परमात्मा सब काल में सर्वत्र व्यापक है, यह जान पापों से निवृत्त रहे ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

त्रितं जूती सपर्यत

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यस्मिन्) = जिस प्रभु में (विश्वानि काव्या) = सब काव्य [वेदज्ञान] इस प्रकार (श्रिता) = आश्रित हैं, (इव) = जैसे (चक्रे) = चक्र में (नाभिः) = नाभि आश्रित होती है। उस (त्रितं) = तीनों के [ त्रीन् तनोति] विस्तार करनेवाले, 'ऋग्, यजु, साम' रूप तीनों के बढ़ानेवाले प्रभु को (जूती) = जव के द्वारा-वेग के द्वारा स्फूत से कर्मों को करने के द्वारा (सपर्यत) = पूजो। [२] (न) = जैसे (गावः) = सब गौवें (व्रजे) = बाड़े में (संयुजे) = साथ मेलवाली होती है, उसी प्रकार युजे उस प्रभु से मेल के लिए (अश्वान्) = इन इन्द्रियाश्वों को (अयुक्षत) = [युज समाधौ ] समाहित करो। इन्द्रियों को इधर-उधर भटकने से रोको जिससे (समे) = सब (अन्यके) = शत्रु (नभन्ताम्) = नष्ट हो जाएँ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- प्रभु में ही सब वेदज्ञान निहित हैं। इस प्रभु को कर्मों द्वारा हम उपासित करें। इन्द्रियों से विषयों में भटकने से रोकें । यही शत्रुनाश का मार्ग है।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यगण ! स वरुणवाच्य ईश्वरः। क्षपः=रात्रीः। परिषस्वजे=परिस्वजते। रात्रावपि मनुष्याणां सर्वाणि कर्माणि पश्यतीत्यर्थः। दर्शतः=परमदर्शनीयः स परमदेवः। उस्रः=उत्सरणशीलः सन्। मायया=स्वबुद्धया। विश्वं सर्वं परि=परितः। निदधे=नितरां दधाति। तस्य व्रतं=नियमम्। वेनीः=कामयमानाः सर्वाः प्रजाः। तिस्रः उषः=त्रिषु कालेष्वित्यर्थः। अवर्धयन्=वर्धयन्ति। सिद्धमन्यत् ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - In him originate, abide, and centre all the imagination, wisdom and poetic creations of the world as in the nave centre all spokes of the wheel. Serve and adore the lord of three worlds and reach him without delay as cows hasten to the stall or as you hasten to yoke the horses to the chariot. May all distortions, dislocations, contradictions and enmities vanish from our life.