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यो ध॒र्ता भुव॑नानां॒ य उ॒स्राणा॑मपी॒च्या॒३॒॑ वेद॒ नामा॑नि॒ गुह्या॑ । स क॒विः काव्या॑ पु॒रु रू॒पं द्यौरि॑व पुष्यति॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yo dhartā bhuvanānāṁ ya usrāṇām apīcyā veda nāmāni guhyā | sa kaviḥ kāvyā puru rūpaṁ dyaur iva puṣyati nabhantām anyake same ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । ध॒र्ता । भुव॑नानाम् । यः । उ॒स्राणा॑म् । अ॒पी॒च्या॑ । वेद॑ । नामा॑नि । गुह्या॑ । सः । क॒विः । काव्या॑ । पु॒रु । रू॒पम् । द्यौःऽइ॑व । पु॒ष्य॒ति॒ । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.४१.५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:41» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:26» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:5


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यगण ! आप (तम्+उ) उसी वरुणवाच्य ईश्वर की (समना) समान (गिरा) स्तुति से (सु) अच्छे प्रकार स्तुति कीजिये (पितृणाम्+च) और अपने पूर्वज पितरों के (मन्मभिः) मननीय स्तोत्रों से स्तुति कीजिये (नाभाकस्य) संसारविरक्त ऋष्यादिकृत (प्रशस्तिभिः) प्रशंसनीय स्तोत्रों से उसकी स्तुति कीजिये। (यः) वरुणदेव (सिन्धूनाम्) स्यन्दनशील इन्द्रियों के (उप) समीप में (उदये) उदित होता है और जो (सप्तस्वसा) दो नयन, दो कर्ण, दो घ्राण और एक मुखस्थ रसना, इन सातों के कल्याणप्रद है, (सः) वही (मध्यमः) सबके मध्य में स्थित है। उसकी स्तुति से (समे+अन्यके+नभन्ताम्) सर्व शत्रु नष्ट हों ॥२॥
भावार्थभाषाः - उसकी स्तुति अपनी भाषा द्वारा या पूर्व रचित स्तोत्र द्वारा किसी प्रकार करे, इससे मनुष्य का कल्याण है ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

धर्ता-कविः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो प्रभु (भुवनानां धर्ता) = सब लोकों का धारण करनेवाले हैं। (यः) = जो प्रभु (उस्त्राणाम्) = वेदवाणी रूप गौओं के (अपीच्या:) = अन्तुहत (गुह्या) = हृदयदेश में प्रकट होनेवाले (नामानि) = नामों को (वेद) = प्राप्त कराते हैं। (सः कवि) = वे प्रभु ही क्रान्तप्रज्ञ है, प्रत्येक वस्तु के मर्म को जानते हैं। [२] वे प्रभु ही (काव्याः) = वेदरूप काव्यों का (पुष्यति) = इस प्रकार पोषण करते हैं, (इव) = जिस प्रकार (द्यौ:) = यह आकाश पुरु (रूपं) = अनेक रूपों का पोषण करता है। इस प्रभु के स्मरण से हमारे (समे) = सब (अन्यके) = शत्रु (नभन्ताम्) = नष्ट हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- प्रभु ही धारक हैं-सब पदार्थों को ज्ञापक है। वे कवि प्रभु ही सब ज्ञानों को देते हुए हमारे शत्रुओं को शीर्ण करते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यगण ! तमु=तमेव वरुणवाच्यमीशम्। समना=समानया। गिरा=स्तुत्या। सु स्तुहि। च पुनः। पितृणां=पूर्वजानाम्। मन्मभिः=मननीयैः स्तोत्रैः। सुपूजय। तथा। नाभाकस्य=संसारनिरक्तस्य ऋष्यादेः। प्रशस्तिभिः=प्रशंसात्मकैः स्तोत्रैश्च पूजय। यः परमात्मा। सिन्धूनां=स्यन्दनशीलानाम् इन्द्रियाणाम्। उप=समीपे। उदये=उद्गच्छति। यश्च। सप्तस्वसा=सप्तानां चक्षुरादीनां। स्वसा=कल्याणप्रदः। स्वं धनं कल्याणं सनोति ददातीति स्वसा स एवेशः। मध्यमः=सर्वेषां मध्ये स्थितः। हे मनुष्यवर्ग ! तेन। समे=सर्वे। अन्यके=अन्ये शत्रवः। नभन्ताम्=नश्यन्तु ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Glorify Varuna who is the holder and sustainer of the galaxies, solar systems and worldly regions of the universe, who knows the nature, forms and names of sun rays, mysteries and even the deepest secrets of existence. He is the omniscient poet and with his creative vision inspires the mind and imagination of poets for creation as he energises and sustains the heaven of light. May all contraries, contradictions, oppositions and enmities vanish.