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यः क॒कुभो॑ निधार॒यः पृ॑थि॒व्यामधि॑ दर्श॒तः । स माता॑ पू॒र्व्यं प॒दं तद्वरु॑णस्य॒ सप्त्यं॒ स हि गो॒पा इ॒वेर्यो॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yaḥ kakubho nidhārayaḥ pṛthivyām adhi darśataḥ | sa mātā pūrvyam padaṁ tad varuṇasya saptyaṁ sa hi gopā iveryo nabhantām anyake same ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । क॒कुभः॑ । नि॒ऽधा॒र॒यः । पृ॒थि॒व्याम् । अधि॑ । द॒र्श॒तः । सः । माता॑ । पू॒र्व्यम् । प॒दम् । तत् । वरु॑णस्य । सप्त्य॑म् । सः । हि । गो॒पाःऽइ॑व । इर्यः॑ । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.४१.४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:41» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:26» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:4


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यगण ! आप (प्रभूतये) स्ववृद्धि, अभ्युदय और कल्याण के लिये (अस्मै) सर्वत्र विद्यमान इस (वरुणाय) परम स्वीकरणीय परमपूज्य परमात्मा की (उ) मन को स्थिरकर (सु) अच्छे प्रकार (अर्च) पूजा करो और (मरुद्भ्यः) जो मितभाषी योगीगण हैं, उनकी भी पूजा करो तथा (विदुष्टरेभ्यः) जो अच्छे विद्वान् हों, उनको भी पूजो (यः) जो वरुणवाच्य परमदेव (मानुषाणाम्) मनुष्यों के (पश्वः) पशुओं को भी (धीता) अपने कर्म से (गाः+इव) पृथिव्यादि लोकों के समान (रक्षति) बचाता है। जिससे (समे) सब ही (अन्यके) शत्रु (नभन्ताम्) नष्ट हों ॥१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा की पूजा यदि मन और श्रद्धा से की जाए, तो सर्व फल देती है और उस उपासक के सर्व विघ्न भी नष्ट हो जाते हैं ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वरुणस्य

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो प्रभु (ककुभः) = सब दिशाओं को (निधारयः) = निश्चय से धारण करते हैं और जो (पृथिव्यां) = इस पृथिवी पर (अधिदर्शतः) = आधिक्येन दर्शनीय है- सर्वत्र [ सब पदार्थों में] उस प्रभु की महिमा दृष्टिगोचर होती है। (सः) = वे प्रभु ही (पूर्व्यं पदं माता) = मोक्षरूप लोक का निर्माण करनेवाले हैं। [२] (वरुणस्य) = द्वेष के निवारण करनेवाले का ही (तत्) = वह (सप्त्यं) = सर्पणयोग्य होता है। इस मोक्षपद को निर्देष व्यक्ति ही पाता है। (सः) = वे प्रभु (हि) = ही (गोपाः इव) = ग्वाले के समान है। ग्वाला जैसे गौओं का रक्षण करता है, उसी प्रकार प्रभु हमारा सबका रक्षण करते हैं। (ईर्यः) = वे प्रभु ही गन्तव्य हैं [ईर् गतौ]। हम सबको उस प्रभु की ओर ही चलना चाहिए, जिससे (समे) = सब (अन्यके) = शत्रु (नभन्ताम्) = नष्ट हो जाएँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- वे प्रभु ही धारक हैं-सर्वत्र प्रभु की ही महिमा दृष्टिगोचर होती है। ये ही मोक्षलोक का भी निर्माण करते हैं। सबके रक्षक है।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्य ! प्रभूतये=प्रभूतिरभ्युदयः कल्याणञ्च। तदर्थम्। अस्मै=प्रत्यक्षवत् प्रसिद्धाय सर्वत्र भासमानाय। वरुणाय। वरुणाय=सर्वैर्वरणीयाय परमात्मने। तथा। विदुष्टरेभ्यः= विद्वत्तरेभ्यश्च। मरुद्भ्यो मितभाषिभ्यो योगिजनेभ्यश्च। उ=निश्चयेन। सुअर्च=सुपूजय। यो वरुणः। धीता=कर्मणा। मनुष्याणाम्। पश्वः=पशून्। गा इव=पृथिवीः इव। रक्षति। तेन रक्षणेन। अस्माकम्। समे=सर्वे। अन्यके=अन्ये शत्रवः। नभन्ताम्=नश्यन्तु ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Glorious, he holds and maintains the bounds of space over the earth. He is the original mother source of existence, he is the ultimate protector and sustainer, the highest adorable worthy of service for the knowledge and attainment of that eternal state of divine existence when and where all contraries, contradictions and enmities would disappear.