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स क्षप॒: परि॑ षस्वजे॒ न्यु१॒॑स्रो मा॒यया॑ दधे॒ स विश्वं॒ परि॑ दर्श॒तः । तस्य॒ वेनी॒रनु॑ व्र॒तमु॒षस्ति॒स्रो अ॑वर्धय॒न्नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa kṣapaḥ pari ṣasvaje ny usro māyayā dadhe sa viśvam pari darśataḥ | tasya venīr anu vratam uṣas tisro avardhayan nabhantām anyake same ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः । क्षपः॑ । परि॑ । स॒स्व॒जे॒ । नि । उ॒स्रः । मा॒यया॑ । दधे॑ । सः । विश्व॑म् । परि॑ । द॒र्श॒तः । तस्य॑ । वेनीः॑ । अनु॑ । व्र॒तम् । उ॒षः । ति॒स्रः । अ॒व॒र्ध॒य॒न् । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.४१.३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:41» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:26» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:3


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उस्त्रः मायया निदधे

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः) = वे प्रभु (क्षप:) = [क्षप् - Throw away ] शत्रुओं को परे फेंकनेवालों का (परिषस्वजे) = आलिंगन करते हैं। (सः उस्रः) = वे प्रकाशमय प्रभु (मायया) = अपनी माया से, प्रज्ञान से (विश्वं निदधे) = सारे संसार को धारण करते हैं। (परिदर्शतः) = वेद दर्शनीय हैं। [२] (तस्य वेनी:) = उस प्रभु की प्राप्ति की कामनावाली प्रजाएँ (व्रतम् अनु) = व्रतों के अनुसार (तिस्रः) = तीनों (उषा) = उषाओं को (अवर्धयन्) = बढ़ाते हैं। 'उषस्' की भावना 'दोष दहन' की है। उपासक लोग व्रतमय जीवन बिताते हुए 'शरीर, मन व बुद्धि' तीनों के दोषों को दग्ध कर देते हैं। ऐसा करने पर (समे) = सब (अन्यके) = शत्रु (नभन्ताम्) = नष्ट हो जाएँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु उन्हीं को प्राप्त होते हैं जो काम-क्रोध को विनष्ट कर देते हैं। व्रती जीवनवाले पुरुष शरीर, मन व बुद्धि के दोषों को दग्ध करते हुए प्रभु को प्राप्त होने के अधिकारी होते हैं।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - He joins and pervades the nights, super-glorious sun as he is, and with his might holds and sustains the world. All people of the world do homage to him in obedience to his law and glorify him through three phases of the day and time, morning, evening and mid day, past, present and future. May all phases of contraries, contradictions and enmities vanish from the world.