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तमू॒ षु स॑म॒ना गि॒रा पि॑तॄ॒णां च॒ मन्म॑भिः । ना॒भा॒कस्य॒ प्रश॑स्तिभि॒र्यः सिन्धू॑ना॒मुपो॑द॒ये स॒प्तस्व॑सा॒ स म॑ध्य॒मो नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tam ū ṣu samanā girā pitṝṇāṁ ca manmabhiḥ | nābhākasya praśastibhir yaḥ sindhūnām upodaye saptasvasā sa madhyamo nabhantām anyake same ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तम् । ऊँ॒ इति॑ । सु । स॒म॒ना । गि॒रा । पि॒तॄ॒णाम् । च॒ । मन्म॑ऽभिः । ना॒भा॒कस्य॑ । प्रस॑स्तिऽभिः॑ । यः । सिन्धू॑नाम् । उप॑ । उ॒त्ऽअ॒ये । स॒प्तऽस्व॑सा । सः । म॒ध्य॒मः । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.४१.२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:41» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:26» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:2


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'सप्तस्वसा' स 'मध्यमः '

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (तम्) = उस प्रभु को (ऊ) = ही (समना गिरा) = मननयुक्त वाणी के द्वारा (च) = तथा (पितृणां मन्मभिः) = रक्षक पुरुषों के मननीय स्तुविचनों के द्वारा तथा (नाभाकस्य) = काम-क्रोध आदि का हिंसन करनेवाले पुरुष के (प्रशस्तिभिः =) शंसनवचनों के द्वारा (सु) [अभिष्टौमि] = सम्यक् स्तुत करता हूँ। [२] (यः) = जो प्रभु (सिन्धूनां) = स्यन्दनशील रेतःकणों के (उप) = समीप (उदये) = [उद्भव] उद्गत होते हैं, अर्थात् रेत: कणों का रक्षण होने पर प्रभु का दर्शन होता है। (सः) = वे प्रभु (सप्तस्वसा) = [सप्त स्व-सृ] सात छन्दोरूप आत्मतत्त्व की ओर ले जानेवाली वेदवाणियोंवाले हैं। (मध्यमः) = सबके मध्य में होनेवाले हैं-सबके अन्दर विद्यमान हैं। इन अन्तः स्थित प्रभु के अनुग्रह से (समे) = सब (अन्यके) = शत्रु (नभन्ताम्) = नष्ट हो जाएँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- ज्ञानयुक्त वाणियों से मननीय स्तोत्रों से तथा शंसनवचनों से हम प्रभु का स्तवन करें। सोमरक्षण के होने पर इस प्रभु का प्रकाश प्राप्त होता है। वे प्रभु सात छन्दोरूप वेदवाणियों के देनेवाले हैं, सबके अन्दर व्याप्त हो रहे हैं। इन्हीं के अनुग्रह से शत्रुओं का विनाश होता है।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Him you adore and glorify with sincere mind, holy voice, songs of forefathers and hymns of sages risen above the problems of lower world. Adore the lord at the heart of things, at the head of the seven streams of existence and at the beginning of the rise of creative evolution of the seven oceans of Prakrti across five gross elements, subtle elements and the spiritual and intelligential world. Do that and all oppositions, contraries and contradictions would disappear.