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यः श्वे॒ताँ अधि॑निर्णिजश्च॒क्रे कृ॒ष्णाँ अनु॑ व्र॒ता । स धाम॑ पू॒र्व्यं म॑मे॒ यः स्क॒म्भेन॒ वि रोद॑सी अ॒जो न द्यामधा॑रय॒न्नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yaḥ śvetām̐ adhinirṇijaś cakre kṛṣṇām̐ anu vratā | sa dhāma pūrvyam mame yaḥ skambhena vi rodasī ajo na dyām adhārayan nabhantām anyake same ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । श्वे॒तान् । अधि॑ऽनिर्निजः । च॒क्रे । कृ॒ष्णान् । अनु॑ । व्र॒ता । सः । धाम॑ । पू॒र्व्यम् । म॒मे॒ । यः । स्क॒म्भेन॑ । वि । रोद॑सी॒ इति॑ । अ॒जः । न । द्याम् । अधा॑रयत् । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.४१.१०

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:41» मन्त्र:10 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:27» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:10


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो वरुण (आसु) इन प्रजाओं में (अत्कः) व्याप्त है अथवा इन में सतत गमनशील है और जो (एषाम्) इन प्राणियों के (विश्वा+जातानि) समस्त उत्पन्न चरित्र को (आशये) जानता है और (धामानि) समस्त स्थानों में (परि) चारों तरफ से (मर्मृशत्) व्याप्त होते हुए (वरुणस्य) वरुण के (गये+पुरः) रथ के सामने (विश्वे+देवाः) समस्त सूर्य्यादि देव (व्रतम्+अनु) नियम के पीछे-२ चलते हैं (नभन्ताम्) इत्यादि पूर्ववत् ॥७॥
भावार्थभाषाः - जिस ईश्वर के नियम के अनुसार सब सूर्य्यादि देव चल रहे हैं, हे मनुष्यों ! उसकी पूजा करो ॥७॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

श्वेतान्+कृष्णान्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो प्रभु (श्वेतान्) = प्रकाश से चमकते हुए श्वेत रंग के (अधिनिर्णिजः) = अति शयेन शुद्ध सूर्य आदि लोकों को (चक्रे) = बनाते हैं, तथा (व्रता अनु) = नियमों के अनुसार [व्रतं = नियम:] (कृष्णान्) = भूमि आदि कृष्ण लोकों को बनाते हैं । (सः) = वे प्रभु ही (पूर्व्यं धाम) = सर्वोत्कृष्ट मोक्षलोक का (ममे) = निर्माण करते हैं। [२] (यः) = जो प्रभु (स्कम्भेन) = अपनी धारक [ थामने की] शक्ति से (रोदसी) = द्यावापृथिवी को (वि अधारयत्) = विशेष रूप से धारण करते हैं। वे (अजः न) = सर्वसंचालक के समान [अज् गतौ ] (द्याम्) = इस देदीप्यमान आदित्य को धारण करते हैं। इस सर्वाधार प्रभु के द्वारा हमारा धारण होने पर (समे) = सब (अन्यके) = शत्रु (नभन्ताम्) = नष्ट हो जाएँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- प्रभु ही स्वयं प्रकाश सूर्य आदि लोकों को तथा स्वयं आकाश [कृष्ण] पृथिवी आदि लोकों को बनाते हैं। प्रभु ही मोक्षलोक का भी निर्माण करनेवाले हैं-प्रभु ही मोक्षलोक हैं। वे अपनी धारणशक्ति से द्युलोक व पृथिवीलोक का धारण करते हैं। सूर्य को भी थामते हैं। इन प्रभु की कृपा से हमारे काम आदि शत्रु विनष्ट हो जाएँ। अगले सूक्त में प्रथम तीन मन्त्रों में 'वरुण' व पिछले तीन मन्त्रों में 'अश्विन' देवता हैं
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - यो वरुणः। आसु=प्रजासु। अत्कः=व्याप्तोऽस्ति। अत सातत्यगमने। अथवा प्रजासु यो सततगामी भवति। यश्च। एषां जनानां। विश्वा=विश्वानि=सर्वाणि। जातानि= चरित्राणि। आशये=आशयति=जानातीत्यर्थः। धामानि= समस्तानि स्थानानि। परि परितः। मर्मृशत्=मृशतः= व्याप्नुवतः। वरुणस्य। गये=रथे। पुनः=पुरस्तात्। विश्वेदेवाः। व्रतं। अनुगच्छन्ति। नभन्तामित्यादि गतम् ॥७॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Varuna, who creates the beautiful world of white and black, light and dark, and the living beings of white and dark character, creates the worlds as ever in accordance with the rules and vows of the law of Dharma and Dharma in action in the earlier life of human beings and others. Thus he, the unborn, maintains the world as he does heaven and the middle regions by his constant might. May all darkness and evil vanish from life.