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प्र ब्रह्मा॑णि नभाक॒वदि॑न्द्रा॒ग्निभ्या॑मिरज्यत । या स॒प्तबु॑ध्नमर्ण॒वं जि॒ह्मबा॑रमपोर्णु॒त इन्द्र॒ ईशा॑न॒ ओज॑सा॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra brahmāṇi nabhākavad indrāgnibhyām irajyata | yā saptabudhnam arṇavaṁ jihmabāram aporṇuta indra īśāna ojasā nabhantām anyake same ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । ब्रह्मा॑णि । न॒भा॒क॒ऽवत् । इ॒न्द्रा॒ग्निऽभ्या॑म् । इ॒र॒ज्य॒त॒ । या । स॒प्तऽबु॑ध्नम् । अ॒र्ण॒वम् । जि॒ह्मऽबा॑रम् । अ॒प॒ऽऊ॒र्णु॒तः । इन्द्रः॑ । ईशा॑नः । ओज॑सा । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.४०.५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:40» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:24» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:5


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सप्तबुध्न जिह्मबार [अर्णव]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (नभाकवत्) = शत्रुओं के हिंसित करनेवाले उपासक के समान (इन्द्राग्निभ्यां) = बल व प्रकाश के देवों के लिए (ब्रह्माणि) = स्तोतों को (प्र इरज्यत) = प्रकर्षेण प्रेरित करो। उन इन्द्र और अग्नि के लिए या जो (सप्तबुध्नं) = [बुध्न-मूल-bottom] 'कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्' दो कान, दो नासिका छिद्र और दो आँखें व मुख रूप सात मूलोंवाले तथा (जिह्मबारम्) = सब जिह्मताओं का [टेढ़ेपन का कुटिलता का] निवारण करनेवाले अर्णवम् ज्ञानसमुद्र को (अपोर्णुतः) = दूरीभूत आवरणवाला करते हैं। इन्द्र और अग्नि की उपासना से ज्ञान चमक उठता है । [२] (इन्द्रः) = यह बल की देवता (ओजसा) = ओजस्विता के द्वारा (ईशानः) = सब अच्छाइयों का ईश बनती है। इसके द्वारा (समे) = सब (अन्यके) = शत्रु (नभन्ताम्) = विनष्ट हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम इन्द्र व अग्नि [ बल व प्रकाश] का आराधन करते हुए ज्ञानसमुद्र को अपगत आवरणवाला करें। इन्द्र हमारे जीवन में सब अच्छाइयों का ईश हो ।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like the sage eager to throw off the veils of ignorance, send up your prayers to Indra and Agni, lord omnipotent and omniscient who, ruling the world of existence with their lustre and majesty, open up the seven fold ocean of obscure and tortuous nature to evolution and reveal the seven stage treasure of mysterious knowledge across fivefold evolution of nature to biological and spiritual stages of knowledge. May all ignorance, frustrations, and alienations vanish.