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अ॒भ्य॑र्च नभाक॒वदि॑न्द्रा॒ग्नी य॒जसा॑ गि॒रा । ययो॒र्विश्व॑मि॒दं जग॑दि॒यं द्यौः पृ॑थि॒वी म॒ह्यु१॒॑पस्थे॑ बिभृ॒तो वसु॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

abhy arca nabhākavad indrāgnī yajasā girā | yayor viśvam idaṁ jagad iyaṁ dyauḥ pṛthivī mahy upasthe bibhṛto vasu nabhantām anyake same ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒भि । अ॒र्च॒ । न॒भा॒क॒ऽवत् । इ॒न्द्रा॒ग्नी इति॑ । य॒जसा॑ । गि॒रा । ययोः॑ । विश्व॑म् । इ॒दम् । जग॑त् । इ॒यम् । द्यौः । पृ॒थि॒वी । म॒ही । उ॒पऽस्थे॑ । बि॒भृ॒तः । वसु॑ । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.४०.४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:40» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:24» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:4


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

यजसा + गिरा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे जीव ! तू (नभाकवत्) = शत्रुओं का ङ्क्षहसन करनेवाले की तरह (इन्द्राग्नी) = बल व प्रकाश के देवों का यजसा यज्ञों के द्वारा (गिरा) = और ज्ञान की वाणियों के द्वारा (अभ्यर्च) = पूजन कर । सामान्यतः यज्ञों के द्वारा इन्द्र [ बल की देवता] का पूजन होता है और ज्ञानवाणियों के द्वारा अग्नि [प्रकाश की देवता] का अर्चन हुआ करता है। [२] उन इन्द्राग्नी का तू पूजन कर (ययोः) = जिनमें (इदं विश्व जगत्) = यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है। सम्पूर्ण जगत् का आधार ये इन्द्र व अग्नि ही तो हैं। इन इन्द्र और अग्नि के (उपस्थे) = उपस्थान में ही (इय्रं द्यौः) = यह मस्तिष्करूप द्युलोक तथा (मही पृथिवी) = यह महत्त्वपूर्ण शरीररूप पृथिवीलोक (वसु) = ज्ञान व शक्तिरूप धनों को (बिभृतः) = धारण करते हैं। इस इन्द्र और अग्नि की उपासना से (समे) = सब (अन्यके) = शत्रु (नभन्ताम्) = नष्ट हो जाएँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम यज्ञों व ज्ञान की वाणियों के द्वारा बल व प्रकाश के देवों का उपासन करें। ये ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के आधार हैं। इन्हीं से मस्तिष्क ज्ञानरूप धनवाला बनता है, तो शरीर शक्तिरूप धनवाला । इनके उपासन से हमारे सब शत्रु समाप्त हो जाएँ।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O man, with a voice friendly and inviting, like a missionary eager to eliminate the negativities and adversities of life, invoke and adore Indra and Agni, lord omnipotent and the leading light of omniscience, in whose treasure hold of nature are held, controlled and protected for promotion and progress this entire world, the moving expansive universe, the heaven, the middle regions, the great mother earth and unbounded wealth, power and excellence for the children of divinity. May all negativities, adversities, deprivations and alienations vanish from the face of the earth.