वांछित मन्त्र चुनें

ता हि मध्यं॒ भरा॑णामिन्द्रा॒ग्नी अ॑धिक्षि॒तः । ता उ॑ कवित्व॒ना क॒वी पृ॒च्छ्यमा॑ना सखीय॒ते सं धी॒तम॑श्नुतं नरा॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tā hi madhyam bharāṇām indrāgnī adhikṣitaḥ | tā u kavitvanā kavī pṛcchyamānā sakhīyate saṁ dhītam aśnutaṁ narā nabhantām anyake same ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ता । हि । मध्य॑म् । भरा॑णाम् । इ॒न्द्रा॒ग्नी इति॑ । अ॒धि॒ऽक्षि॒तः । ता । ऊँ॒ इति॑ । क॒वि॒ऽत्व॒ना । क॒वी इति॑ । पृ॒च्छ्यमा॑ना । स॒खी॒ऽय॒ते । सम् । धी॒तम् । अ॒श्नु॒त॒म् । नरा॑ । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.४०.३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:40» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:24» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:3


0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

वही सर्वधन का स्वामी भी है, यह दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (पूर्व्य) हे पूर्ण (अग्ने) सर्वाधार परमदेव ! (नः+आयुषु) हमारे मनुष्यों में (त्वम्) तू ही (वस्वः+इरज्यसि) धनका स्वामी है (देवेषु) देवों में भी (एकः) एक तू ही धन का स्वामी है। (त्वाम्) तेरे चारों तरफ (आपः+परि+यन्ति) जल की धारा बहती है, जो (परिस्रुतः) तेरी कृपा से सर्वत्र फैल रही है और जो (स्वसेतवः) अपने नियम में बद्ध है या स्यन्दनशील है। हे ईश ! तेरी कृपा से जगत् के (समे) सब ही (अन्यके) अन्य शत्रु (नभन्ताम्) नष्ट हो जाएँ या इनको तू ही दूर कर दे ॥१०॥
भावार्थभाषाः - धनों की कामना से भी वही प्रार्थनीय है, क्योंकि सर्वधन का स्वामी वही है और जिससे धन उत्पन्न होता है, वह जल भी उसी के अधीन हैं ॥१०॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उत्तम भरण- ज्ञान व उत्तम कर्म

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ता इन्द्राग्नी) = वे इन्द्र और अग्नि बल व प्रकाश के देव (हि) = ही (भराणां मध्यं अधिक्षितः) = अपना ठीक से भरण करनेवाले लोगों के मध्यलोक अर्थात् हृदयान्तरिक्ष में निवास करते हैं। (स्तुतः) = इन्हीं के कारण वे अपना भरण कर पाते हैं। (ता) = वे (उ) = ही (कवित्वना) = वेदरूप काव्य के द्वारा (कवी) = क्रान्तदर्शी बनते हैं । इन्द्र व अग्नि की उपासना हमें प्रकृष्ट ज्ञान को प्राप्त कराती है। [२] ये इन्द्र और अग्नि (पृच्छ्यमाना) = प्रार्थना किए जाते हुए (नरा) = हमें उन्नतिपथ पर ले- चलते हैं। हम बल व प्रकाश की ही प्रार्थना करेंगे तो निरन्तर उन्नत होंगे ही। (सखीयते) = मित्र की तरह आचरण करनेवाले मनुष्य के लिए (धीतं) = उत्तम कर्मों को (सम् अश्नुतं) = सम्यक् व्याप्त करते हैं। बल व प्रकाश के होने पर उत्तम ही कर्म होते हैं । हे इन्द्राग्नी ! आपके अनुग्रह से (समे) = सब (अन्यके) =‍ शत्रु (नभन्ताम्) = विनष्ट हो जाएँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- बल व प्रकाश का आराधन हमें उत्तम भरणवाला, ज्ञानी व उत्तम कर्मोंवाला बनाता है ।
0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

स एव सर्वधनस्वामीति दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने ! त्वम्। नः=अस्माकम्। आयुषु=मनुष्येषु। आयव इति मनुष्यनाम। वस्वः=धनस्य। इरज्यसि=ईशिषे। हे पूर्व्य=पूर्णः ! त्वमेक एव। देवेष्वपि धनस्येशिषे। स्वसेतवः=स्वयमेव स्यन्दनशीलाः सामर्थ्यादायुक्ताः। अतः परिस्रुतः=परिस्रवन्त्यः। आपः=जलानि। त्वाम्। परियन्ति। प्राप्नुवन्ति। समे=सर्वे। अन्यके=अन्यशत्रवः। नभन्ताम्=विनश्यन्तु। विनाशयन्तां वा। नभतिहिंसाकर्म ॥१०॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Both Indra and Agni like fire and lightning reside and rule at the heart of life struggles. May they, we pray, leading lights, prophetic voices and patriarchal spirits for the loving and friendly, invoked for guidance and answers to questions and mysteries of life, come and, with their vision and wisdom, resolve our doubts and questions to settled certainties of decisive action. May all negativities, adversities, frustrations and enmities vanish from the world.