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तं शि॑शीता सुवृ॒क्तिभि॑स्त्वे॒षं सत्वा॑नमृ॒ग्मिय॑म् । उ॒तो नु चि॒द्य ओज॑सा॒ शुष्ण॑स्या॒ण्डानि॒ भेद॑ति॒ जेष॒त्स्व॑र्वतीर॒पो नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

taṁ śiśītā suvṛktibhis tveṣaṁ satvānam ṛgmiyam | uto nu cid ya ojasā śuṣṇasyāṇḍāni bhedati jeṣat svarvatīr apo nabhantām anyake same ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तम् । शि॒शी॒त॒ । सु॒वृ॒क्तिऽभिः॑ । त्वे॒षम् । सत्वा॑नम् । ऋ॒ग्मिय॑म् । उ॒तो इति॑ । नु । चि॒त् । यः । ओज॑सा । शुष्ण॑स्य । आ॒ण्डानि॑ । भेद॑ति । जेष॑त् । स्वः॑ऽवतीः । अ॒पः । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.४०.१०

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:40» मन्त्र:10 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:25» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:10


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

जेषत् स्वर्वतीः अपः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (तं) = उस प्रभु को (सुवृक्तिभिः) = पापवर्जन की हेतुभूत उत्तम स्तुतियों से (शिशीत) = [संस्कुरुत] अपने अन्दर तीक्ष्ण व संस्कृत करो, अर्थात् प्रभु की भावना को अपने अन्दर बढ़ाने का प्रयत्न करो। जो प्रभु त्वेषं दीप्त हैं, (सत्वानम्) = शक्तिशाली हैं व (ऋग्मियम्) = ऋचाओं से स्तुति के योग्य हैं। [२] उन प्रभु को अपने अन्दर प्रादुर्भूत करो (उत उ नु चित्) = और निश्चय से (यः) = जो (ओजसा) = शक्ति के द्वारा (शुष्णस्य आण्डानि) = शोक कामदेव के अपत्यों को भी [अण्डात् जातानि] (भेदति) = विदीर्ण कर देते हैं, अर्थात् प्रभु कामदेव को भस्म कर देते हैं। काम को नष्ट करके प्रभु ही (स्वर्वती:) = प्रकाश व सुख को प्राप्त करानेवाले (अपः) = रेतः कणरूप जलों का (जेषत्) = विजय करते हैं। कामाग्नि की रेत: कणरूप जलों को विनष्ट करती है, इस कामाग्नि के विध्वंस से रेतःकणों का रक्षण होता ही है और ऐसा होने पर (समे) = सब (अन्यके) = शत्रु (नभन्ताम्) = नष्ट हो जाएँ। वीर्यरक्षण के होने पर सब रोग व वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- हम स्तुति के द्वारा प्रभु को अपने में दीप्त करें। प्रभु की शक्ति हमारी वासना का विनाश करती है और वीर्यरक्षण द्वारा प्रकाश व सुख को प्राप्त कराती है।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - With hymns and holy actions adore and glorify Indra, resplendent lord who commands the purity and truth of reality, who is adorable, who with his power and brilliance, dries up and roots out the origins and products of drought, greed and exploitation and sets aflow the liberal streams of joy and prosperity. May all poverty, exploitation, greed and unhappiness vanish from the world of humanity.