वांछित मन्त्र चुनें

इन्द्रा॑ग्नी यु॒वं सु न॒: सह॑न्ता॒ दास॑थो र॒यिम् । येन॑ दृ॒ळ्हा स॒मत्स्वा वी॒ळु चि॑त्साहिषी॒मह्य॒ग्निर्वने॑व॒ वात॒ इन्नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indrāgnī yuvaṁ su naḥ sahantā dāsatho rayim | yena dṛḻhā samatsv ā vīḻu cit sāhiṣīmahy agnir vaneva vāta in nabhantām anyake same ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्रा॑ग्नी॒ इति॑ । यु॒वम् । सु । नः॒ । सह॑न्ता । दास॑थः । र॒यिम् । येन॑ । दृ॒ळ्हा । स॒मत्ऽसु॑ । आ । वी॒ळु । चि॒त् । स॒हि॒षी॒महि॑ । अ॒ग्निः । वना॑ऽइव । वाते॑ । इत् । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.४०.१

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:40» मन्त्र:1 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:24» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:1


0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

उसी की व्यापकता दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (यः+अग्निः+सप्तमानुषः) जो सर्वाधार परमात्मा सप्तमनुष्यों का ईश्वर है (विश्वेषु+समुद्रेषु) निखिल नदियों समुद्रों, और आकाशों में (श्रितः) व्यापक है, (तम्+अग्निम्+आगन्म) उसको हम उपासकगण प्राप्त होवें। जो पुनः (त्रिपस्त्यम्) तीनों लोकों में स्थित है (मन्धातुः) और जो उपासकों के (दस्युहन्तमम्) निखिल विघ्नों का हननकर्त्ता है और (अग्निम्) सर्वाधार है और (यज्ञेषु+पूर्व्यम्) यज्ञों में प्रथम पूजनीय और परिपूर्ण है ॥८॥
भावार्थभाषाः - सप्तमानुष=दो नयन, दो कर्ण, दो घ्राण और एक रसना ये ही सप्त मनुष्य हैं। अथवा पृथिवी पर सात प्रकार के मनुष्यवंश। त्रिपस्त्यं=पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युलोक ये ही तीन लोक वा तीन गृह वा तीन स्थान हैं, अतः इनका शासक व्यापक जगदीश परमपूज्य है ॥८॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'इन्द्र व अग्नि' के द्वारा शत्रुपराभव

पदार्थान्वयभाषाः - [१] 'इन्द्र' बल का प्रतीक है और 'अग्नि' प्रकाश का। हे (इन्द्राग्नी) = बल व प्रकाश के देवो !(युवं) = आप (सु) = सम्यक् (सहन्ता) = शत्रुओं का पराभव करनेवाले हो। आप शत्रुओं का पराभव करके आ= हमारे लिए (रयिं) = ऐश्वर्य को (दासथः) = देते है। [२] आप हमारे लिए उस ऐश्वर्य को देते हो (येन) = जिससे कि (समत्सु) = संग्रामों में (दृळ्हा) = दृढ़ और (वीळु चित्) = निश्चय से अतिप्रबल भी शत्रुओं को (आसाहिषीमहि) = समन्तात् पराभूत करनेवाले हों। इस प्रकार शत्रुओं को पराभूत करनेवाले हों (इव) = जैसे (अग्निः) = आग (वाते) = वायु के होने पर (इत्) = निश्चय से (वना) = वनों को विनष्ट कर डालता है। हे प्रभो ! आपके आनुग्रह से (समे) = सब (अन्यके) = शत्रु (नभन्ताम्) = नष्ट हो जाएँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- बल व प्रकाश का सम्पादन करते हुए हम संग्रामों में सब शत्रुओं का पराभव करनेवाले हों।
0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

तदीयव्यापकतां दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - योऽग्निः=य ईश्वरः। सप्तमानुषः=सप्तमानवेश्वरः। यश्च विश्वेषु=सर्वेषु। सिन्धुषु=नदीषु=समुद्रेषु आकाशेषु च। श्रितः=व्यापकोऽस्ति। तमग्निम्। वयमुपासकाः। आगन्म=प्राप्नुयाम। कीदृशम्। त्रिपस्त्यम्=त्रिषु लोकेषु स्थितम्। मन्धातुः=मान्धातुः=मामीश्वरं दधातीति मन्धाता=ईश्वरोपासकस्तस्य। दस्युहन्तमम्= दस्यूनामतिशयेन हन्तारम्। यज्ञेषु पूर्व्यम्=प्रथमं पूजनीयम्। शेषं पूर्ववत् ॥८॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of power and honour, Agni, lord of light and knowledge, commanding lightning and fire, patience and endurance, strength and courage, give us that positive and irresistible wealth of life by which we may face, resist and throw off strong and violent adversaries as fire fanned by winds destroys forests. May negativities, adversities, alienations and enmities all vanish.