जीवन के तीनों सवनों की सम्यक् पूर्ति
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्राग्नी) = बल व प्रकाश के देवो! आप (इमा) = इन (सवना) = जीवन के तीनों सवनों की - प्रातः, मध्याह्न व तृतीय सवन की प्रथम २४ वर्ष [प्रातः सवन], मध्य के ४४ वर्ष [माध्यन्दिन सवन], अन्तिम ४८ वर्षों [तृतीय सवन] का (जुषेथाम्) = प्रीतिपूर्वक सेवन करो। बल व प्रकाश के द्वारा हम जीवनयज्ञ के तीनों सवनों को पूरा कर पाएँ। [२] (येभिः) = जिन सवनों के उद्देश्य से (हव्यानि) = हव्य पदार्थों को (ऊहथुः) = आप धारण करते हो। हव्य [पवित्र] पदार्थों का सेवन करते हुए हम जीवन के तीनों सवनों को पूरा करें। हे (नरा) = हमें उन्नति पथ पर ले चलनेवाले इन्द्राग्नी ! आप (आगतम्) = हमें प्राप्त होवें ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:-बल व प्रकाश के दिव्यभाव हमारे जीवनयज्ञ के तीनों सवनों को पूर्ण करें। उनकी पूत के हेतु से ये हव्य पदार्थों का सेवन करें।