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क्षेम॑स्य च प्र॒युज॑श्च॒ त्वमी॑शिषे शचीपत॒ इन्द्र॒ विश्वा॑भिरू॒तिभि॑: । माध्यं॑दिनस्य॒ सव॑नस्य वृत्रहन्ननेद्य॒ पिबा॒ सोम॑स्य वज्रिवः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kṣemasya ca prayujaś ca tvam īśiṣe śacīpata indra viśvābhir ūtibhiḥ | mādhyaṁdinasya savanasya vṛtrahann anedya pibā somasya vajrivaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

क्षेम॑स्य । च॒ । प्र॒ऽयुजः॑ । च॒ । त्वम् । ई॒शि॒षे॒ । श॒ची॒ऽप॒ते॒ । इन्द्र॑ । विश्वा॑भिः । ऊ॒तिऽभिः॑ । माध्य॑न्दिनस्य । सव॑नस्य । वृ॒त्र॒ऽह॒न् । अ॒ने॒द्य॒ । पिब॑ । सोम॑स्य । व॒ज्रि॒ऽवः॒ ॥ ८.३७.५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:37» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:19» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:5


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'योगक्षेम के ईश' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - हे (शचीपते) = सब प्रज्ञानों व कर्मों के स्वामिन्! (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! ये आप (विश्वाभिः ऊतिभिः) = सब रक्षणों के द्वारा (क्षेमस्य च) = क्षेम के प्राप्त वस्तुओं के रक्षण के (च) = तथा (प्रयुजः) = प्रयोग के अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति के (ईशिषे) = ईश हैं। आप ही सबके योगक्षेम को सिद्ध करते हैं। अवशिष्ट मन्त्र भाग मन्त्र संख्या एक पर देखिए ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सम्पूर्ण योगक्षेम के ईश प्रभु ही हैं। मनुष्य को यह सोचकर निःशंक भाव से कर्तव्य कर्मों में लगे रहना चाहिए।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, mighty ruler presiding over the nation, master of divine eloquence and decisive action, with all your safeguards, precautions and tactical actions you govern and promote our consolidated assets, investments and acquisitions safely and positively. O lord of thunderous power, implacable law and inevitable justice, O destroyer of evil, suffering and poverty, adorable beyond question and criticism, come and taste the pleasure and progress of our yajnic programme at the peak of the day’s success.