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श्या॒वाश्व॑स्य सुन्व॒तस्तथा॑ शृणु॒ यथाशृ॑णो॒रत्रे॒: कर्मा॑णि कृण्व॒तः । प्र त्र॒सद॑स्युमाविथ॒ त्वमेक॒ इन्नृ॒षाह्य॒ इन्द्र॒ ब्रह्मा॑णि व॒र्धय॑न् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śyāvāśvasya sunvatas tathā śṛṇu yathāśṛṇor atreḥ karmāṇi kṛṇvataḥ | pra trasadasyum āvitha tvam eka in nṛṣāhya indra brahmāṇi vardhayan ||

पद पाठ

श्या॒वऽअ॑श्वस्य । सु॒न्व॒तः । तथा॑ । शृ॒णु॒ । यथा॑ । अशृ॑णोः । अत्रेः॑ । कर्मा॑णि । कृ॒ण्व॒तः । प्र । त्र॒सद॑स्युम् । आ॒वि॒थ॒ । त्वम् । एकः॑ । इत् । नृ॒ऽसह्ये॑ । इन्द्र॑ । ब्रह्मा॑णि । व॒र्धय॑न् ॥ ८.३६.७

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:36» मन्त्र:7 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:18» मन्त्र:7 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:7


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

त्रसदस्यु का रक्षण [ब्रह्माणि वर्धयन्]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो ! इस (श्यावाश्वस्य) = गतिशील इन्द्रियाश्वोंवाले (सुन्वतः) = सोम का अपने में अभिषव करनेवाले वीर्यशक्ति का सम्पादन करनेवाले की प्रार्थना को आप तथा (शृणु) = उसी प्रकार सुनिये (यथा) = जैसे (कर्माणि कृण्यतः) = कर्मों को करते हुए (अत्रेः) = काम-क्रोध-लोभ से रहित पुरुष की प्रार्थना को (अशृणोः) = सुनते हैं। [२] हे (इन्द्र) = शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो ! (त्वम्) = आप (एकः इत्) = अकेले ही (ब्रह्माणि) = ज्ञानों व स्तोत्रों को (वर्धयन्) = बढ़ाते हुए, (नृषाह्ये) = युद्ध में (त्रसदस्युम्) = काम-क्रोध-लोभ आदि शत्रुओं को भयभीत करनेवाले इस त्रसदस्यु को (प्र आविथ) = प्रकर्षेण रक्षित करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु उसी की प्रार्थना को सुनते हैं जो - [क] गतिशील इन्द्रियाश्वोंवाला है, [ख] सोम का सम्पादन करता है, [ग] काम-क्रोध-लोभ से ऊपर उठता है, [घ] और यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त रहता है। ज्ञानों व स्तवन वृत्ति को बढ़ाते हुए प्रभु इसको 'त्रसदस्यु' बनाते हैं, काम-क्रोध-लोभ आदि से इसका रक्षण करते हैं। अगले सूक्त के ऋषि देवता भी क्रमश: 'श्यावाश्व' व 'इन्द्र' ही हैं-
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, mighty lord of humanity, listen to the prayer of the sage creator of soma and his songs of ecstasy created with a disciplined mind and sense as well as with disciplined will and imagination, just as you listen to the songs of the sage of threefold freedom doing acts of service to humanity and divinity. You protect the sage fighter against evil, tyranny and exploitation all by yourself in the battles of humanity, thereby exalting the songs and actions in honour of divinity. Won’t you listen to me?