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श्ये॒नावि॑व पतथो ह॒व्यदा॑तये॒ सोमं॑ सु॒तं म॑हि॒षेवाव॑ गच्छथः । स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण च॒ त्रिर्व॒र्तिर्या॑तमश्विना ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śyenāv iva patatho havyadātaye somaṁ sutam mahiṣevāva gacchathaḥ | sajoṣasā uṣasā sūryeṇa ca trir vartir yātam aśvinā ||

पद पाठ

श्ये॒नौऽइ॑व । प॒त॒थः॒ । ह॒व्यऽदा॑तये । सोम॑म् । सु॒तम् । म॒हि॒षाऽइ॑व । अव॑ । ग॒च्छ॒थः॒ । स॒ऽजोष॑सौ । उ॒षसा॑ । सूर्ये॑ण । च॒ । सोम॑म् । पि॒ब॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ ॥ ८.३५.९

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:35» मन्त्र:9 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:15» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:9


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे राजन् ! तथा मन्त्रिवर्ग ! आप दोनों (हव्यदातये) दानी पुरुष के लिये (सुतं+सोमम्) मनुष्यसम्पादित सोम की ओर (श्येनौ+इव) श्येन नाम के पक्षी जैसे (पतथः) जाते हैं। यह आपकी अधिक प्रशंसा है ॥९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

श्येनौ इव

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अश्विना) = प्राणापानो! आप (हव्यदातये) = [हव्यानांदातिः यस्य] यज्ञशील पुरुष के लिये (सुतं सोमं) = उत्पन्न हुए हुए सोम के प्रति इस प्रकार (पतथः) = गति करते हो, (इव) = जिस प्रकार (श्येनौ) = दो श्येन [बाज ] पक्षी गति करते हैं। श्येन गतिशील हैं, प्राणापान भी गतिशील हैं। श्येन शत्रुभूत पक्षियों को समाप्त करता है, ये प्राणापान शत्रुभूत वासनाओं को समाप्त करते हैं। वासना समाप्ति के द्वारा ये हमें यज्ञशील बनाते हैं। शेष मन्त्रभाग मन्त्र संख्या सात पर द्रष्टव्य है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणापान दो श्येन पक्षियों के समान हैं। ये वासनारूप चिड़ियों को समाप्त करके सोम का रक्षण करते हैं, और हमें यज्ञशील बनाते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे राजानौ ! हव्यदातये=हव्यदात्रे=दानकर्त्त्रे पुरुषाय। सुतं सोमं प्रति। श्येनौ विहगौ इव पतथो गच्छथः। व्याख्यातमन्यत् ॥९॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like falcons you fly carrying holy gifts to the generous yajaka. Like veteran scholars you fly to assess the merit of our soma distilled in yajnic experiments and to anticipate its future possibilities. O twin divines united with the sun and the dawn, come thrice in the day, visit our sessions and help us to advance.