वांछित मन्त्र चुनें

हा॒रि॒द्र॒वेव॑ पतथो॒ वनेदुप॒ सोमं॑ सु॒तं म॑हि॒षेवाव॑ गच्छथः । स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण च॒ त्रिर्व॒र्तिर्या॑तमश्विना ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

hāridraveva patatho vaned upa somaṁ sutam mahiṣevāva gacchathaḥ | sajoṣasā uṣasā sūryeṇa ca trir vartir yātam aśvinā ||

पद पाठ

हा॒रि॒द्र॒वाऽइ॑व । प॒त॒थः॒ । वना॑ । इत् । उप॑ । सोम॑म् । सु॒तम् । म॒हि॒षाऽइ॑व । अव॑ । ग॒च्छ॒थः॒ । स॒ऽजोष॑सौ । उ॒षसा॑ । सूर्ये॑ण । च॒ । सोम॑म् । पि॒ब॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ ॥ ८.३५.७

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:35» मन्त्र:7 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:15» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:7


0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विनौ) हे राजन् तथा मन्त्रिन् ! (हारिद्रवा+इव) जैसे पिपासाकुल हारिद्रव पक्षी (वना+इत्) जलों की ओर उड़ते हैं, वैसे ही आप दोनों हम लोगों की रक्षा के लिये इतस्ततः (पतथः) जाते हैं और (महिषा+इव) जैसे महिष पिपासित होकर जल की ओर दौड़ते हैं, तद्वत् आप (सुतम्) गृहस्थों से सम्पादित (सोमम्) समस्त पदार्थ को देखने के लिये (अवगच्छथः) दौड़ते हैं। (अश्विना) हे अश्विदेवो ! (त्रिः) प्रतिदिन तीनवार (वर्तिः+यातम्) कार्य्यावेक्षण के लिये इतस्ततः यात्रा करें ॥७॥
0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

त्रिः वर्तिः यातमश्विना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अश्विना) = प्राणापानो! आप (सुतं सोमम्) = उत्पन्न हुए हुए सोम [वीर्यशक्ति] की ओर इस प्रकार (अवगच्छथः) = जाते हो (इव) = जैसे (हारिद्रवा) = सारस पक्षि विशेष (इत्) = निश्चय से (वना उप पतथ:) = जलों के समीप प्राप्त होते हैं अथवा (इव) = जिस प्रकार (महिषा) = पिपासित भैंसें पानी की ओर जाती हैं। प्राण इन सोमों में ही विचरते हैं, इन्हें वे शरीर में ही पीने का प्रयत्न करते हैं। [२] हे प्राणापानो! आप (उषसा सूर्येण च सजोषसा) = उषाकाल व सूर्य के साथ प्रीतिपूर्वक सेवन किये जाते हुए (त्रिः) = तीन प्रकार से (वर्तिः यातम्) = मार्ग का आक्रमण करो। तीन प्रकार से मार्ग के आक्रमण का भाव यह है कि ज्ञानपूर्वक कर्म करते हुए उन कर्मों को परमेश्वरार्पण करनेवाले बनो। इस प्रकार जीवन में 'ज्ञान कर्म व उपासना' का समन्वय करो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- जलचर हारिद्रव पक्षियों की तरह हमारे प्राणापान सोमकणों में विचरें। पिपासित महिषों की तरह ये सोमकणों का पान करनेवाले हों । प्राणसाधना के होने पर ये प्राणापान हमारे जीवन में ज्ञान कर्म व उपासना का समन्वय करें।
0 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्विनौ राजानौ ! हारिद्रवा इव=यथा हारिद्रवौ विहगौ। पिपासितौ वना इत्=वनानि अरण्यानि उदकानि वा। वनमिति उदकनामापि। गच्छतः तथैव युवाम्। रक्षार्थं पतथो गच्छथः। अपि च। महिषा इव यथा पिपासितौ महिषौ उदकानि गच्छतः। तथैव युवामपि। सुतं गृहस्थैः सम्पादितं सोमं सर्वं वस्तु द्रष्टुम्। अवगच्छथः। हे अश्विनौ ! युवां त्रिस्त्रिवारम्। प्रत्यहं। वर्तिमार्गं। यातम् गच्छतम्। अन्यद् व्याख्यातम् ॥७॥
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, you reach our yajna eagerly as a thirsty bird flies to water and, like a veteran scholar, you understand and recognise the nectar sweet soma that we have distilled from our yajnic project and you anticipate the future possibilities too. O divine twin powers of the circuitous energy of natural and social dynamics, in unison with the sun and dawn, come to our project thrice a day.