पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अश्विना) = प्राणापानो! आप (सुतं सोमम्) = उत्पन्न हुए हुए सोम [वीर्यशक्ति] की ओर इस प्रकार (अवगच्छथः) = जाते हो (इव) = जैसे (हारिद्रवा) = सारस पक्षि विशेष (इत्) = निश्चय से (वना उप पतथ:) = जलों के समीप प्राप्त होते हैं अथवा (इव) = जिस प्रकार (महिषा) = पिपासित भैंसें पानी की ओर जाती हैं। प्राण इन सोमों में ही विचरते हैं, इन्हें वे शरीर में ही पीने का प्रयत्न करते हैं। [२] हे प्राणापानो! आप (उषसा सूर्येण च सजोषसा) = उषाकाल व सूर्य के साथ प्रीतिपूर्वक सेवन किये जाते हुए (त्रिः) = तीन प्रकार से (वर्तिः यातम्) = मार्ग का आक्रमण करो। तीन प्रकार से मार्ग के आक्रमण का भाव यह है कि ज्ञानपूर्वक कर्म करते हुए उन कर्मों को परमेश्वरार्पण करनेवाले बनो। इस प्रकार जीवन में 'ज्ञान कर्म व उपासना' का समन्वय करो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- जलचर हारिद्रव पक्षियों की तरह हमारे प्राणापान सोमकणों में विचरें। पिपासित महिषों की तरह ये सोमकणों का पान करनेवाले हों । प्राणसाधना के होने पर ये प्राणापान हमारे जीवन में ज्ञान कर्म व उपासना का समन्वय करें।