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गिरो॑ जुषेथामध्व॒रं जु॑षेथां॒ विश्वे॒ह दे॑वौ॒ सव॒नाव॑ गच्छतम् । स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण॒ चेषं॑ नो वोळ्हमश्विना ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

giro juṣethām adhvaraṁ juṣethāṁ viśveha devau savanāva gacchatam | sajoṣasā uṣasā sūryeṇa ceṣaṁ no voḻham aśvinā ||

पद पाठ

गिरः॑ । जु॒षे॒था॒म् । अ॒ध्व॒रम् । जु॒षे॒था॒म् । विश्वा॑ । इ॒ह । दे॒वौ॒ । सव॑ना । अव॑ । ग॒च्छ॒त॒म् । स॒ऽजोष॑सौ । उ॒षसा॑ । सूर्ये॑ण । च॒ । सोम॑म् । पि॒ब॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ ॥ ८.३५.६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:35» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:14» मन्त्र:6 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:6


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (देवौ) हे देव ! हे राजन् ! हे अमात्यगण ! आप सब (गिरः) हम लोगों की सब प्रकार की भाषाओं को (जुषेथाम्) जानें और (अध्वरम्) अखिल यज्ञ को (जुषेथाम्) सेवें (इह) इस संसार में ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ज्ञान-यज्ञ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्राणापानो! (गिरः जुषेथाम्) = आप ज्ञान की वाणियों का सेवन करो। प्राणसाधना से बुद्धि की तीव्रता होकर हमारी ज्ञान प्रवणता होती ही है। उस ज्ञान के अनुसार (अध्वरम्) = हिंसारहित कर्मों का (जुषेथाम्) = सेवन करो। अवशिष्ट मन्त्र भाग मन्त्र संख्या चार में व्याख्यात है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से हमारी रुचि ज्ञान व यज्ञों की ओर प्रेरित होती है।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे देवौ राजानौ। युवाम्। अस्माकं गिरो वाणीर्विविधा भाषाः। जुषेथां सेवेथाम्। तथा अध्वरं अखिलयज्ञञ्च जुषेथाम्। अन्यद् व्याख्यातम् ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Divine Ashvins, listen to our song and understand, join and cherish our yajnic project of non- violent creation, come to all our sessions, O generous harbingers of food, energy and wealth and, united with the dawn and the sun, bring us plenty of food, energy and all round advancement to our heart’s desire here and now.