पदार्थान्वयभाषाः - [१] (उषसा सूर्येण च सजोषसा) = उषाकाल से सूर्योदय तक प्रीतिपूर्वक सेवन किये जाते हुए (अश्विना) = प्राणापानो (नः) = हमारे लिये (इषं वोढम्) = प्रभु प्रेरणा को प्राप्त कराओ। प्राणसाधना से मन के दोष दूर होकर, उस पवित्र हृदय में ही प्रभु प्रेरणा के सुनने का सम्भव होता है। [२] इस प्रभु प्रेरणा को प्राप्त कराने के द्वारा, हे प्राणापानो! आप (यज्ञं जुषेथाम्) = यज्ञ का सेवन करो । (मे हवस्य बोधते) = मेरी पुकार को जानो, अर्थात् मुझे प्रभु प्रार्थना की वृत्तिवाला बनाओ। मैं नम्रता से प्रभु का आवाहन करनेवाला बनूँ। हे देवौ दिव्य गुणों को विकसित करनेवाले प्राणपानो! आप (इह) = इस जीवन में विश्वा सवना सब निर्माणात्मक कार्यों को (अवगच्छतम्) = जानो, अर्थात् सदा निर्माणात्मक कार्य करनेवाले बनो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से पवित्रीभूत हृदय में हम प्रभु प्रेरणा को सुनते हैं । उस प्रेरणा के अनुसार यज्ञशील बनते हैं, प्रार्थना की वृत्तिवाले होते हैं और सदा निर्माणात्मक कार्यों को करते हैं।
अन्य संदर्भ: सूचना - 'सवन' शब्द से 'प्रातः सवन, माध्यन्दिन सवन तथा तृतीय सवन' का ग्रहण करें तो अर्थ यह होगा कि सब सवनों को प्राप्त करो, अर्थात् २४+४४+४८ = ११६ वर्ष तक जीनेवाले बनो। प्रातः सवन=प्रथम २४ वर्ष, माध्यन्दिन सवन = अगले ४४ वर्ष तृतीय सवन अन्तिम ४८ वर्ष ।