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जु॒षेथां॑ य॒ज्ञं बोध॑तं॒ हव॑स्य मे॒ विश्वे॒ह दे॑वौ॒ सव॒नाव॑ गच्छतम् । स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण॒ चेषं॑ नो वोळ्हमश्विना ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

juṣethāṁ yajñam bodhataṁ havasya me viśveha devau savanāva gacchatam | sajoṣasā uṣasā sūryeṇa ceṣaṁ no voḻham aśvinā ||

पद पाठ

जु॒षेथा॑म् । य॒ज्ञम् । बोध॑तम् । हव॑स्य । मे॒ । विश्वा॑ । इ॒ह । दे॒वौ॒ । सव॑ना । अव॑ । ग॒च्छ॒त॒म् । स॒ऽजोष॑सौ । उ॒षसा॑ । सूर्ये॑ण । च॒ । सोम॑म् । पि॒ब॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ ॥ ८.३५.४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:35» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:14» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:4


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विना+देवौ) हे राजदेव ! तथा मन्त्रिदलदेव ! आप सब मिलकर (यज्ञम्) शुभकर्म को (जुषेथाम्) प्रीतिपूर्वक सेवें। (मे) मेरे (हवस्य) आह्वान को (बोधतम्) जानें या प्राप्त करें। आप दोनों (उषसा) मृदुता और (सूर्येण+च) तीक्ष्णता से (सजोषसा) संयुक्त होकर आप (नः) हम लोगों के निकट (इषम्) अन्न (आ+वोढम्) मँगवावें ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

यज्ञ-प्रार्थना-सवन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (उषसा सूर्येण च सजोषसा) = उषाकाल से सूर्योदय तक प्रीतिपूर्वक सेवन किये जाते हुए (अश्विना) = प्राणापानो (नः) = हमारे लिये (इषं वोढम्) = प्रभु प्रेरणा को प्राप्त कराओ। प्राणसाधना से मन के दोष दूर होकर, उस पवित्र हृदय में ही प्रभु प्रेरणा के सुनने का सम्भव होता है। [२] इस प्रभु प्रेरणा को प्राप्त कराने के द्वारा, हे प्राणापानो! आप (यज्ञं जुषेथाम्) = यज्ञ का सेवन करो । (मे हवस्य बोधते) = मेरी पुकार को जानो, अर्थात् मुझे प्रभु प्रार्थना की वृत्तिवाला बनाओ। मैं नम्रता से प्रभु का आवाहन करनेवाला बनूँ। हे देवौ दिव्य गुणों को विकसित करनेवाले प्राणपानो! आप (इह) = इस जीवन में विश्वा सवना सब निर्माणात्मक कार्यों को (अवगच्छतम्) = जानो, अर्थात् सदा निर्माणात्मक कार्य करनेवाले बनो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से पवित्रीभूत हृदय में हम प्रभु प्रेरणा को सुनते हैं । उस प्रेरणा के अनुसार यज्ञशील बनते हैं, प्रार्थना की वृत्तिवाले होते हैं और सदा निर्माणात्मक कार्यों को करते हैं।
अन्य संदर्भ: सूचना - 'सवन' शब्द से 'प्रातः सवन, माध्यन्दिन सवन तथा तृतीय सवन' का ग्रहण करें तो अर्थ यह होगा कि सब सवनों को प्राप्त करो, अर्थात् २४+४४+४८ = ११६ वर्ष तक जीनेवाले बनो। प्रातः सवन=प्रथम २४ वर्ष, माध्यन्दिन सवन = अगले ४४ वर्ष तृतीय सवन अन्तिम ४८ वर्ष ।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्विनौ देवौ। यज्ञं जुषेथां प्रीत्या सेवेथाम्। मे मम। हवस्य=हवमाह्वानं बोधतं वित्तम्। इहात्र संसारे। विश्वा=विश्वानि सर्वाणि। सवना=सवनानि यज्ञान्। अवगच्छतं प्राप्नुतम्। इषमन्नञ्च नोऽस्मान्। आवोढं=प्रापयतम्। सिद्धमन्यत् ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Divine Ashvins, twin harbingers of nature and humanity, listen to our call, know our purpose, come and join all our sessions of yajnic creation and, equally in tune with the soothing glory of the dawn and blazing intensity of the sun, bring us food and energy here and now.