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विश्वै॑र्दे॒वैस्त्रि॒भिरे॑काद॒शैरि॒हाद्भिर्म॒रुद्भि॒र्भृगु॑भिः सचा॒भुवा॑ । स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण च॒ सोमं॑ पिबतमश्विना ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

viśvair devais tribhir ekādaśair ihādbhir marudbhir bhṛgubhiḥ sacābhuvā | sajoṣasā uṣasā sūryeṇa ca somam pibatam aśvinā ||

पद पाठ

विश्वैः॑ । दे॒वैः । त्रि॒ऽभिः । ए॒का॒द॒शैः । इ॒ह । अ॒त्ऽभिः । म॒रुत्ऽभिः । भृगु॑ऽभिः । स॒चा॒ऽभुवा॑ । स॒ऽजोष॑सौ । उ॒षसा॑ । सूर्ये॑ण । च॒ । सोम॑म् । पि॒ब॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ ॥ ८.३५.३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:35» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:14» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:3


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे राजन् ! तथा अमात्यदल ! आप (विश्वैः+देवैः) सर्वदेव अर्थात् (त्रिभिः) त्रिगुणित (एकादशैः) एकादश याने ३३ (तेंतीस) देवों के (अद्भिः) जलों के (मरुद्भिः) मरुद्गणों के तथा (भृगुभिः) भर्जनकारी अग्नियों के (सचाभुवा) साथ ही उत्पन्न हुए हैं। आगे पूर्ववत् ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्राणसाधना व तेंतीस देव

पदार्थान्वयभाषाः - [१] उषाकाल में सूर्योदय तक सेवन किये जाते हुए ये प्राणापान सोम का शरीर में रक्षण करें। [२] (इह) = इस जीवन में (त्रिभिः एकादशैः) = ११ पृथिवीलोक में, ११ अन्तरिक्षलोक में तथा ११ द्युलोक में इस प्रकार तीन गुणा ग्यारह, अर्थात् तेंतीस (विश्वैः देवैः) = सब देवों के साथ (सचाभुवा) = समवेत होकर होनेवाले ये प्राणापान सोम का पान करें। प्राणसाधना के द्वारा त्रिलोकी के ये तेंतीस देवता इस शरीर में भी विकसित होते हैं। पृथिवी के ग्यारह देवताओं का मुखिया अग्नि' है, अन्तरिक्ष के ११ देवों का मुखिया वायु है और द्युलोक के ११ देवों का मुखिया सूर्य है। प्राणसाधक के भी स्थूल शरीर में अग्नि व शक्ति की उष्णता होती है, हृदय में [वा गतौ ] गति का संकल्प होता है और मस्तिष्क में ज्ञान का सूर्य होता है। [२] (अद्भिः) = [अप्= कर्म] कर्मों के साथ, (मरुद्भिः) = शरीर में कार्य करनेवाली सब वायुओं के साथ तथा (भृगुभिः) = [भ्रस्ज् पाके] ज्ञान परिपाकों के साथ समवेत होकर होनेवाले ये प्राणापान सोम का पान करें। प्राणसाधक कर्मशील व परिपक्व ज्ञानवाला बनता है और उसके शरीर में सब वायुवें अपना-अपना कार्य ठीक प्रकार से करती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से शरीर में तेंतीस के तेंतीस देवों का ठीक विकास होता है। प्राणसाधक कर्मशील व परिपक्व ज्ञानवाला बनता है। इसके शरीर में सब मरुत् [वायु] ठीक से कार्य करते हुए शरीर का रक्षण करते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्विनौ। युवां विश्वैः=सर्वैर्देवैः। त्रिभिरेकादशैः=त्रयस्त्रिंशद्भिः। अद्भिर्जलैः। मरुद्भिर्मरुद्गणैः। भृगुभिर्भर्जनकारिभिरग्निभिः। सचाभुवा सहभूतौ स्थः। अन्यदुक्तम् ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, associated with all the thirty three brilliant, plentiful and generous divine powers of nature and humanity, scientifically energised liquids, vibrant pilots and controlled winds, intellectuals and scientists who dispel the darkness and ignorance of society, and in union with the dawn of a new sun in life, receive, preserve, develop and bring the soma energy for the peace and joy of humanity here and now.