पदार्थान्वयभाषाः - [१] उषाकाल में सूर्योदय तक सेवन किये जाते हुए ये प्राणापान सोम का शरीर में रक्षण करें। [२] (इह) = इस जीवन में (त्रिभिः एकादशैः) = ११ पृथिवीलोक में, ११ अन्तरिक्षलोक में तथा ११ द्युलोक में इस प्रकार तीन गुणा ग्यारह, अर्थात् तेंतीस (विश्वैः देवैः) = सब देवों के साथ (सचाभुवा) = समवेत होकर होनेवाले ये प्राणापान सोम का पान करें। प्राणसाधना के द्वारा त्रिलोकी के ये तेंतीस देवता इस शरीर में भी विकसित होते हैं। पृथिवी के ग्यारह देवताओं का मुखिया अग्नि' है, अन्तरिक्ष के ११ देवों का मुखिया वायु है और द्युलोक के ११ देवों का मुखिया सूर्य है। प्राणसाधक के भी स्थूल शरीर में अग्नि व शक्ति की उष्णता होती है, हृदय में [वा गतौ ] गति का संकल्प होता है और मस्तिष्क में ज्ञान का सूर्य होता है। [२] (अद्भिः) = [अप्= कर्म] कर्मों के साथ, (मरुद्भिः) = शरीर में कार्य करनेवाली सब वायुओं के साथ तथा (भृगुभिः) = [भ्रस्ज् पाके] ज्ञान परिपाकों के साथ समवेत होकर होनेवाले ये प्राणापान सोम का पान करें। प्राणसाधक कर्मशील व परिपक्व ज्ञानवाला बनता है और उसके शरीर में सब वायुवें अपना-अपना कार्य ठीक प्रकार से करती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से शरीर में तेंतीस के तेंतीस देवों का ठीक विकास होता है। प्राणसाधक कर्मशील व परिपक्व ज्ञानवाला बनता है। इसके शरीर में सब मरुत् [वायु] ठीक से कार्य करते हुए शरीर का रक्षण करते हैं।