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र॒श्मीँरि॑व यच्छतमध्व॒राँ उप॑ श्या॒वाश्व॑स्य सुन्व॒तो म॑दच्युता । स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण॒ चाश्वि॑ना ति॒रोअ॑ह्न्यम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

raśmīm̐r iva yacchatam adhvarām̐ upa śyāvāśvasya sunvato madacyutā | sajoṣasā uṣasā sūryeṇa cāśvinā tiroahnyam ||

पद पाठ

र॒श्मीन्ऽइ॑व । य॒च्छ॒त॒म् । अ॒ध्व॒रान् । उप॑ । श्या॒वऽअ॑श्वस्य । सु॒न्व॒तः । म॒द॒ऽच्यु॒ता॒ । स॒ऽजोष॑सौ । उ॒षसा॑ । सूर्ये॑ण । च॒ । सोम॑म् । पि॒ब॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ ॥ ८.३५.२१

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:35» मन्त्र:21 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:17» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:21


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे राजन् तथा मन्त्रिमण्डल ! आप (सुन्वतः) शुभकर्मों में प्रवृत्त (श्यावाश्वस्य) रोगीजन के (अध्वरान्) हिंसारहित यागों को (रश्मीन्+इव) घोड़े के लगाम जैसे (यच्छतम्) संभालिये। शेष पूर्ववत् •॥२१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

रश्मि-अध्वर

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्राणापानो! आप (रश्मीन् इव) = ज्ञान की किरणों की तरह (अध्वरान्) = हिंसारहित यज्ञात्मक कर्मों को (उपयच्छतम्) = हमारे लिये दो अथवा हमारे अन्दर इनका नियमन करो। शेष मन्त्र भाग मन्त्र संख्या १९ पर द्रष्टव्य है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना द्वारा ज्ञानकिरणों का वर्धन होता है और हमारे जीवनों में यज्ञात्मक कर्म चलते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे राजानौ ! सुन्वतः श्यावाश्वस्य। अध्वरान् शुभकर्माणि सारहितानि। रश्मीन् इव=अश्वस्य प्रग्रहानिव। यच्छतं धारयतम्। शेषं व्याख्यातम् ॥२१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins who shatter the pride and arrogance of evil forces, take over the yajnic programmes of the scholar of solar science and promote them like radiations of the sun and steer them by controls in unison with the sun and the dawn to advance them further than the last stage completed till the last day.