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सर्गाँ॑ इव सृजतं सुष्टु॒तीरुप॑ श्या॒वाश्व॑स्य सुन्व॒तो म॑दच्युता । स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण॒ चाश्वि॑ना ति॒रोअ॑ह्न्यम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sargām̐ iva sṛjataṁ suṣṭutīr upa śyāvāśvasya sunvato madacyutā | sajoṣasā uṣasā sūryeṇa cāśvinā tiroahnyam ||

पद पाठ

सर्गा॑न्ऽइव । सृ॒ज॒त॒म् । सु॒ऽस्तु॒तीः । उप॑ । श्या॒वऽअ॑श्वस्य । सु॒न्व॒तः । म॒द॒ऽच्यु॒ता॒ । स॒ऽजोष॑सौ । उ॒षसा॑ । सूर्ये॑ण । च॒ । सोम॑म् । पि॒ब॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ ॥ ८.३५.२०

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:35» मन्त्र:20 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:17» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:20


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विना) हे अश्विद्द्वय अर्थात् हे राजन् ! तथा हे मन्त्रिमण्डल ! आप दोनों (सुन्वतः) शुभकर्म करते हुए (श्यावाश्वस्य) पापरोगपीड़ित जन की (सुष्टुतीः) अच्छी स्तुतियों को (सर्गान्+इव) आभरणों के समान (उपसृजतम्) हृदय में धारण कीजिये। शेष पूर्ववत् ॥२०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सर्ग- सुष्टुति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्राणापानो! आप (सर्गान्) = हमारे अन्दर दृढ़ निश्चयों को, लक्ष्य स्थान पर पहुँचने के भावों को और (इव) = इन अध्यवसायों की तरह (सुष्टुती:) = उत्तम स्तुतियों को उपसृजतम् उत्पन्न करो। शेष मन्त्र भाग मन्त्र संख्या १९ पर व्याख्यात है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्राणसाधना के द्वारा अध्यवसाय व उत्तम स्तुतिवाले बनें।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्विनौ राजानौ ! सुन्वतः=शुभकर्माणि कुर्वतः। श्यावाश्वस्य=मलिनेन्द्रियस्य पापरोगिणः पुरुषस्य। सुष्टुतीः=शोभनाः स्तुतीः। सर्गानिव=आभरणानीव उपसृजतं धारयतम्। शिष्टमुक्तम् ॥२०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, breakers of pride and arrogance, listen to the prayer and exhortation of the scholar of solar rays who creates something new toward the improvement of life and, in unison with the sun and the dawn, support and augment his invention like a new creation completed the day before.