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ब्रह्म॑ जिन्वतमु॒त जि॑न्वतं॒ धियो॑ ह॒तं रक्षां॑सि॒ सेध॑त॒ममी॑वाः । स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण च॒ सोमं॑ सुन्व॒तो अ॑श्विना ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

brahma jinvatam uta jinvataṁ dhiyo hataṁ rakṣāṁsi sedhatam amīvāḥ | sajoṣasā uṣasā sūryeṇa ca somaṁ sunvato aśvinā ||

पद पाठ

ब्रह्म॑ । जि॒न्व॒त॒म् । उ॒त । जि॒न्व॒त॒म् । धियः॑ । ह॒तम् । रक्षां॑सि । सेध॑तम् । अमी॑वाः । स॒ऽजोष॑सौ । उ॒षसा॑ । सूर्ये॑ण । च॒ । सोम॑म् । पि॒ब॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ ॥ ८.३५.१६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:35» मन्त्र:16 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:16» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:16


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विना) हे राजन् तथा हे मन्त्रिदल ! आप दोनों (ब्रह्म) ज्ञानिदल को (जिन्वतम्) प्रसन्न रक्खें (धियः) विद्याप्रचार आदि व्यापार से उनकी बुद्धियों को बढ़ाया करें। उनकी शान्ति के लिये (रक्षांसि) अखिल विघ्नों को या दुष्ट पुरुषों को (हतम्) दूर किया करें और (अमीवा) विविध चिकित्सालयों से तथा जलवायु के शोधने से विविध रोगों को (सेधतम्) देश से भगाया करें। हे राजन् ! (सोमम्+सुन्वतम्) शुभ कर्म करनेवालों की रक्षा किया करें। शेष पूर्ववत् ॥१६॥•
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ब्रह्म-धियः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अश्विना) = प्राणापानो! आप हमारे अन्दर (ब्रह्म जिन्वतम्) = ज्ञान का प्रीणन [वर्धन] करिये। (उत) = और (धियः जिन्वतम्) = ज्ञान पूर्वक किये जानेवाले कर्मों का वर्धन करिये। (रक्षांसि) = रोगकृमियों व आसुरी भावों का (हतम्) = विनाश करिये। तथा (अमीवाः) = रोगों का (सेधतम्) = निषेध करिये, रोगों को हमारे से दूर करिये। [२] (उषसा सूर्येण च) = उषाकाल के तथा सूर्य के (सजोषसा) = साथ प्रीतिपूर्वक सेवन किये जाते हुए आप (सोमं सुन्वतः) = हमारे अन्दर सोम का सम्पादन करिये। उषाकाल में सूर्योदय तक प्राणसाधना करते हुए हम शरीर में सोमशक्ति का सम्यक् सम्पादन करनेवाले हों। प्राणायाम द्वारा सोम के शरीर में ही व्याप्त करने का प्रयत्न करें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से सोम [वीर्य] शरीर में ही व्याप्त होता है। इससे हमारे ज्ञान व दूर होते हैं और रोग विनष्ट हो ज्ञानपूर्वक किये जानेवाले कर्मों का वर्धन होता है। राक्षसीभाव जाते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्विना राजानौ ! युवाम्। ब्रह्म=मेधायुक्तं ज्ञानिदलं। जिन्वतं=प्रीणयतम्। उत अपि च। ब्रह्मज्ञानार्थं धियो बुद्धीः। जिन्वतं प्रीणयतं वर्धयतं विद्याप्रचारैः। अपि च। रक्षांसि=अखिलान् विघ्नान् दुष्टान् वा हतं=हिंस्तम्। अमीवा रोगांश्च सेधतं=निषेधतम्। युवां पुनः। सोमं शुभकर्म। सुन्वतः कुर्वतः पुरुषांश्च रक्षतम् ॥१६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Animate and energise the visionaries of universal values, animate and energise the intellectuals, animate and energise the people in general, destroy the evil and destructive forces, fight out diseases and create the soma of good health and joy in unison with the sun and the dawn of every new day.