वांछित मन्त्र चुनें

पारा॑वतस्य रा॒तिषु॑ द्र॒वच्च॑क्रेष्वा॒शुषु॑ । तिष्ठं॒ वन॑स्य॒ मध्य॒ आ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pārāvatasya rātiṣu dravaccakreṣv āśuṣu | tiṣṭhaṁ vanasya madhya ā ||

पद पाठ

पारा॑वतस्य । रा॒तिषु॑ । द्र॒वत्ऽच॑क्रेषु । आ॒शुषु॑ । तिष्ठ॑म् । वन॑स्य । मध्ये॑ । आ ॥ ८.३४.१८

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:34» मन्त्र:18 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:13» मन्त्र:8 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:18


0 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पारावत

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु 'पारावत' हैं, पार हैं, अवत हैं। सब कर्मों को पार लगानेवाले हैं, प्रभु कृपा ही हमें सब कर्मों के अन्त तक ले जाती है। वे प्रभु अवत हैं, रक्षक हैं। इन (पारावतस्य) = पारावत प्रभु के (रातिषु) = दानों में, इस प्रभु से दिये जानेवाले (द्रवच्चक्रेषु) = गतिमय रथचक्रोंवाले (आशुषु) = कर्मों में व्याप्त रहनेवाले इन्द्रियाश्वों के ऊपर (तिष्ठम्) = मैं स्थित हूँ। [२] इसी का परिणाम है कि मैं (वनस्य मध्ये) = प्रकाश की किरणों के बीच में स्थित होता हूँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु मुझे गतिमय चक्रोंवाले शरीर रथ को देते हैं। इसमें कर्मों में व्याप्त होनेवाले इन्द्रियाश्व जुते हैं। इनके द्वारा मैं सदा ज्ञानरश्मियों में निवास करूँ। गतिशील इन्द्रियाश्वोंवाला 'श्यावाश्व' अगले सूक्त का ऋषि है। वह 'अश्विनौ' का आराधन करता है-
0 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O lord of light and power, let me be established among the generous and profuse gifts of the farthest spaces, moving at the fastest in the dynamics of the whirling wheels of time, ultimately at peace somewhere at the centre of eternal truth, goodness and beauty of divinity.