य ऋ॒ज्रा वात॑रंहसोऽरु॒षासो॑ रघु॒ष्यद॑: । भ्राज॑न्ते॒ सूर्या॑ इव ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
ya ṛjrā vātaraṁhaso ruṣāso raghuṣyadaḥ | bhrājante sūryā iva ||
पद पाठ
ये । ऋ॒ज्राः । वात॑ऽरंहसः । अ॒रु॒षासः॑ । र॒घु॒ऽस्यदः॑ । भ्राज॑न्ते । सूर्याः॑ऽइव ॥ ८.३४.१७
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:34» मन्त्र:17
| अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:13» मन्त्र:7
| मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:17
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
कैसे इन्द्रियाश्व ?
पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार हम उन इन्द्रियाश्वों को पाते हैं (ये) = जो (ऋज्राः) = ऋजुगामी हैं, सरल मार्ग से चलनेवाले हैं। (वातरंहसः) = वायु के समान वेगवाले हैं। (अरुषासः) = आरोचमान हैं। (रघुष्यदः) = खूब तीव्र गतिवाले हैं। [२] ये इन्द्रियाश्व (सूर्याः इव) = सूर्यों के समान (भ्राजन्ते) = चमकते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम प्रभु की उपासना से ऋजुगामी, वातवेगवाले, आरोचमान, तीव्रगतिवाले, सूर्यवत् दीप्त इन्द्रियाश्वों को प्राप्त करें।
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Those who follow straight paths of truth and rectitude, advance vibrant like the winds, love brilliance without violence and move forward at the shortest wave length of speed, shine like stars.
