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आ यदिन्द्र॑श्च॒ दद्व॑हे स॒हस्रं॒ वसु॑रोचिषः । ओजि॑ष्ठ॒मश्व्यं॑ प॒शुम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā yad indraś ca dadvahe sahasraṁ vasurociṣaḥ | ojiṣṭham aśvyam paśum ||

पद पाठ

आ । यत् । इन्द्रः॑ । च॒ । दद्व॑हे॒ इति॑ । स॒हस्र॑म् । वसु॑ऽरोचिषः । ओजि॑ष्ठम् । अश्व्य॑म् । प॒शुम् ॥ ८.३४.१६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:34» मन्त्र:16 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:13» मन्त्र:6 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:16


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'सहस्रा ओजिष्ठ अश्व्य पशु'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (वसुरोचिषः) = ज्ञान कीदीतिरूप धनवाले हम (इन्द्रः च) = और परमैश्वर्यशाली प्रभु, (यत्) = जो (सहस्रम्) = [स+हस्] आनन्द से युक्त है तथा (ओजिष्ठम्) = ओजस्वितम है उस (पशुम्) = [पश्यति] सब पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करनेवाले (अश्व्यम्) = इन्द्रियाश्व समूह को (आदद्वहे) = सर्वथा प्राप्त करते हैं। [२] (वसुरोचिष्) = उत्तम इन्द्रियाश्व समूह को प्राप्त करते हैं। परन्तु करते प्रभु की सहायता से ही हैं। सो कहते हैं कि 'वसुरोचिष् और इन्द्र'। ये इन्द्रियाँ स्वस्थ होती हुई 'सु+ख' का कारण होती हैं, सो 'सहस्रं' विशेषण है। ज्ञान प्राप्ति का साधन बनती हैं, सो 'पशुं' विशेषण है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम ज्ञानदीप्तिरूप धनवाले बनकर प्रभु की उपासना करते हुए ओजस्वी- आनन्द की कारणभूत ज्ञान को प्राप्त करानेवाली इन्द्रियों को पाते हैं।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Let us all, and Indra too, lovers of peace, wealth, honour, power and excellence, win a thousandfold wealth of brilliant progress and advancement.