आ न॑: सहस्र॒शो भ॑रा॒युता॑नि श॒तानि॑ च । दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
ā naḥ sahasraśo bharāyutāni śatāni ca | divo amuṣya śāsato divaṁ yaya divāvaso ||
पद पाठ
आ । नः॒ । स॒ह॒स्र॒ऽशः । भ॒र॒ । अ॒युता॑नि । श॒तानि॑ । च॒ । दि॒वः । अ॒मुष्य॑ । शास॑तः । दिव॑म् । य॒य । दि॒वा॒व॒सो॒ इति॑ दिवाऽवसो ॥ ८.३४.१५
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:34» मन्त्र:15
| अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:13» मन्त्र:5
| मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:15
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
अयुतानि शतानि च
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे जीव ! तू (नः) = हमारे इन (अयुतानि) = लाखों (च) = और (शतानि) = सैंकड़ों अथवा (अ-युतानि) = आत्मा से पृथक् न होनेवाले (शतानि च) = और सौ के सौ वर्ष तक ठीक से चलनेवाले ज्ञानधनों को (सहस्त्रशः) = हजारों प्रकार से (आभर) = अपने अन्दर धारण कर। [२] हे ज्ञानधन जीव ! तू उस प्रकाशमय शासक के ज्ञानधन को प्राप्त हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम आत्मा से पृथक् न होनेवाले ज्ञानों को शतवर्षपर्यन्त अनेक प्रकार से धारण करनेवाले बनें। ज्ञान को ही धन समझें।
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Bring us, give us, riches, powers and excellences in hundreds, thousands and lacs, even more, unbounded all, and from the light and culture of this order of earthly rule, O lover of peace and light of heaven, rise to heavenly light and eternal joy.
