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आ नो॒ गव्या॒न्यश्व्या॑ स॒हस्रा॑ शूर दर्दृहि । दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā no gavyāny aśvyā sahasrā śūra dardṛhi | divo amuṣya śāsato divaṁ yaya divāvaso ||

पद पाठ

आ । नः॒ । गव्या॑नि । अश्व्या॑ । स॒हस्रा॑ । शू॒र॒ । द॒र्दृ॒हि॒ । दि॒वः । अ॒मुष्य॑ । शास॑तः । दिव॑म् । य॒य । दि॒वा॒व॒सो॒ इति॑ दिवाऽवसो ॥ ८.३४.१४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:34» मन्त्र:14 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:13» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:14


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों का ग्रथन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (शूर) = शत्रुओं को शीर्ण करनेवाले जीव ! तू (नः) = हमारे से दिये हुए (सहस्त्रा) = इन अनेकों (गव्यानि) = ज्ञानेन्द्रिय समूहों को तथा (अश्वा) = कर्मेन्द्रिय समूहों को (आदर्दृहिः) = सर्वथा ग्रथित कर [string to gether] ये मिलकर कार्य करनेवाली हों। परस्पर अविरुद्ध रूप से ये ज्ञानेन्द्रियाँ व कर्मेन्द्रियाँ कार्यों को करनेवाली हों। [२] हे ज्ञानधन जीव ! तू उस प्रकाशमय शासक के ज्ञानधन को प्राप्त कर।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु से दी गई इन ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों को एक सूत्र में ग्रथित कर कार्य करनेवाले बनें। वही ज्ञानवृद्धि का मार्ग है। इसी से हम उस प्रभु से दिये जानेवाले ज्ञानधन को प्राप्त करेंगे।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Give us a thousand riches of lands and cows, culture and enlightenment, O brave ruler, give us and develop communications and transport, and from the light and rule of this earthly order, O lover of heavenly light, rise to the light of heaven and eternal joy.