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आ या॑हि॒ पर्व॑तेभ्यः समु॒द्रस्याधि॑ वि॒ष्टप॑: । दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā yāhi parvatebhyaḥ samudrasyādhi viṣṭapaḥ | divo amuṣya śāsato divaṁ yaya divāvaso ||

पद पाठ

आ । या॒हि॒ । पर्व॑तेभ्यः । स॒मु॒द्रस्य । अधि॑ । वि॒ष्टपः॑ । दि॒वः । अ॒मुष्य॑ । शास॑तः । दिव॑म् । य॒य । दि॒वा॒व॒सो॒ इति॑ दिवाऽवसो ॥ ८.३४.१३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:34» मन्त्र:13 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:13» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:13


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पर्वतों व समुद्रों से प्रभु की ओर

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु जीव से कहते हैं कि तू (पर्वतेभ्यः) = इन पर्वतों से (आयाहि) = हमारे समीप प्राप्त हो । पर्वतों पर प्राकृतिक शोभा को देखता हुआ तू रचयिता का स्मरण करनेवाला बन। इसी प्रकार (समुद्रस्य अधिविष्टप:) = समुद्र के इस लोक से [विष्टप्-लोक] तू हमें प्राप्त हो। समुद्र भी तो प्रभु की महिमा का प्रतिपादन कर रहा है। ये समुद्र और पर्वत तुझे प्रभु के समीप प्राप्त करानेवाले हों 'यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रं रसया सहाहुः । [२] हे ज्ञानधन जीव ! तू उस प्रकाशमय शासक से ज्ञानधन को प्राप्त कर |
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम पर्वतों व समुद्रों में प्रभु की महिमा का स्मरण करते हुए प्रभु को प्राप्त हों। उस प्रभु से प्रकाश को प्राप्त करें।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Come from the mountains and the clouds, come over the seas and hasten from the farthest regions of the globe, rule, and from the light of this order of rule, O lover of light and giver of peace and settlement, rise to the light of heaven.