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सरू॑पै॒रा सु नो॑ गहि॒ सम्भृ॑तै॒: सम्भृ॑ताश्वः । दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sarūpair ā su no gahi sambhṛtaiḥ sambhṛtāśvaḥ | divo amuṣya śāsato divaṁ yaya divāvaso ||

पद पाठ

सऽरू॑पैः । आ । सु । नः॒ । ग॒हि॒ । सम्ऽभृ॑तैः । सम्भृ॑तऽअश्वः । दि॒वः । अ॒मुष्य॑ । शास॑तः । दिव॑म् । य॒य । दि॒वा॒व॒सो॒ इति॑ दिवाऽवसो ॥ ८.३४.१२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:34» मन्त्र:12 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:13» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:12


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सम्भृताश्व

पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु को हम प्राप्त तभी करेंगे यदि इन्द्रियाश्वों को ठीक रखेंगे। सो प्रभु कहते हैं कि (सम्भृताश्वः) = सम्यक् भृत-भरण किये गये इन्द्रियाश्वोंवाला तू (सम्मृतैः) = इन सम्यक् पोषित (सरूपैः) = रूप युक्त, अर्थात् तेजस्वी इन्द्रियाश्वों से (नः) = हमें (सु) = सम्यक् (आगहि) = प्राप्त हो । इन्द्रियों का (स) = रूप व सम्भृत बनाकर हम यात्रा को पूर्ण करें और प्रभु को प्राप्त हों। [२] हे ज्ञानधन जीव ! तू उस प्रकाशमय शासक के ज्ञानधन को प्राप्त कर ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम सम्भृताश्व बनें। इन्द्रियों का ठीक भरण करके प्रभु को प्राप्त हों। उस प्रकाशमय प्रभु से ज्ञान के प्रकाश को प्राप्त करें।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Vested with the fullness of a dynamic personality with sensitive perceptions, conceptions and apprehensions, come to us with colleagues and companions of equal calibre and take over the reins of leadership, and from the light and wisdom of the earthly order, O lover of light and heaven, rise to the heavenly light of love and benediction.